Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
੧੬੦ ]ਯੋਗੀਨ੍ਦੁਦੇਵਵਿਰਚਿਤ: [ ਅਧਿਕਾਰ-੧ : ਦੋਹਾ-੯੭
अथ निर्मलमात्मानं ध्यायस्व येन ध्यातेनान्तर्मुहूर्तेनैव मोक्षपदं लभ्यत इति
निरूपयति —
९७) अप्पा झायहि णिम्मलउ किं बहुएँ अण्णेण ।
जो झायंतहँ परम-पउ लब्भइ एक्क-खणेण ।।९७।।
आत्मानं ध्यायस्व निर्मलं किं बहुना अन्येन ।
यं ध्यायमानानां परमपदं लभ्यते एकक्षणेन ।।९७।।
अप्पा झायहि णिम्मलउ आत्मानं ध्यायस्व । कथंभूतं निर्मलम् । किं बहुएं अण्णेण
किं बहुनान्येन शुद्धात्मबहिर्भूतेन रागादिविकल्पजालमालाप्रपञ्चेन । जो झायंतहं परमपउ
आत्मामें निश्चल होना वह सम्यक्चारित्र है, यह निश्चयरत्नत्रय साक्षात् मोक्षका कारण है, इनसे
बंध कैसे हो सकता है ? कभी नहीं हो सकता ।।९६।।
आगे ऐसा कहते हैं, कि निर्मल आत्माको ही ध्यावो, जिसके ध्यान करनेसे अंतर्मुहूर्तमें
(तात्काल) मोक्षपदकी प्राप्ति हो —
गाथा – ९७
अन्वयार्थ : — हे योगी तू [निर्मलं आत्मानं ] निर्मल आत्माका ही [ध्यायस्व ] ध्यान
कर, [अन्येन बहुना किं ] और बहुत पदार्थोंसे क्या । देश काल पदार्थ आत्मासे भिन्न हैं, उनसे
कुछ प्रयोजन नहीं है, रागादि-विकल्पजालके समूहोंके प्रपंचसे क्या फ ायदा, एक निज
स्वरूपको ध्यावो, [यं ] जिस परमात्माके [ध्यायमानानां ] ध्यान करनेवालोंको [एकक्षणेन ]
क्षणमात्रमें [परमपदं ] मोक्षपद [लभ्यते ] मिलता है ।
भावार्थ : — सब शुभाशुभ संकल्प-विकल्प रहित निजशुद्ध आत्मस्वरूपके ध्यान
करनेसे शीघ्र ही मोक्ष मिलता है, इसलिये वही हमेशा ध्यान करने योग्य है । ऐसा ही
ਥਵੁਂ ਤੇ ਸਮ੍ਯਗ੍ਚਾਰਿਤ੍ਰ ਛੇ. ਜ੍ਯਾਰੇ ਆ ਤ੍ਰਣੇਯ ਗੁਣ ਆਤ੍ਮਸ੍ਵਰੂਪ ਛੇ ਤੋ ਏਨਾਥੀ ਕਰ੍ਮੋਨੋ ਬਂਧ ਕੇਵੀ
ਰੀਤੇ ਥਈ ਸ਼ਕੇ? (ਅਰ੍ਥਾਤ੍ ਥਈ ਸ਼ਕਤੋ ਨਥੀ, ਤੇ ਨਿਸ਼੍ਚਯਰਤ੍ਨਤ੍ਰਯ ਸਾਕ੍ਸ਼ਾਤ੍ ਮੋਕ੍ਸ਼ਨੁਂ ਕਾਰਣ ਛੇ.) ੯੬.
ਹਵੇ, ਕਹੇ ਛੇ ਕੇ ਤੁਂ ਨਿਰ੍ਮਲ਼ ਆਤ੍ਮਾਨੁਂ ਧ੍ਯਾਨ ਕਰ ਕੇ ਜੇਨੁਂ ਧ੍ਯਾਨ ਕਰਵਾਥੀ ਤੁਂ ਅਂਤਰ੍ਮੁਹੂਰ੍ਤਮਾਂ
ਜ ਮੋਕ੍ਸ਼ਪਦ ਪਾਮੀਸ਼ : —
ਭਾਵਾਰ੍ਥ: — ਸਮਸ੍ਤ ਸ਼ੁਭਾਸ਼ੁਭ ਸਂਕਲ੍ਪਵਿਕਲ੍ਪਰਹਿਤ ਸ੍ਵਸ਼ੁਦ੍ਧਾਤ੍ਮਤਤ੍ਤ੍ਵਨਾ ਧ੍ਯਾਨਥੀ