Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Punjabi transliteration). Gatha-171 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
ਅਧਿਕਾਰ-੨ : ਦੋਹਾ-੧੭੧ ]ਪਰਮਾਤ੍ਮਪ੍ਰਕਾਸ਼: [ ੪੯੫
रागादिरहितं शुद्धात्मपरिणाममिति अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा द्रष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षा-
प्रभृतिसमस्तचिन्ताजालं त्यक्त्वापि चिन्तारहिते शुद्धात्मतत्त्वे सर्वतात्पर्येण भावना कर्तव्येति
तात्पर्यम्
।।१७०।।
अथ
३०२) जोइय दुम्मइ कवुण तुहँ भवकारणि ववहारि
बंभु पवंचहिँ जो रहिउ सो जाणिवि मणु मारि ।।१७१।।
योगिन् दुर्मतिः का तव भवकारणे व्यवहारे
ब्रह्म प्रपंचैर्यद् रहितं तत् ज्ञात्वा मनो मारय ।।१७१।।
जोइय इत्यादि जोइय हे योगिन् दुम्मइ कवुण तुहं दुर्मतिः का तवेयं भवकारणि
ਅਹੀਂ, ਆ ਵ੍ਯਾਖ੍ਯਾਨ ਜਾਣੀਨੇ ਦ੍ਰਸ਼੍ਟ, ਸ਼੍ਰੁਤ, ਅਨੁਭੂਤ, (ਦੇਖੇਲਾ, ਸਾਂਭਲ਼ੇਲਾ ਅਨੇ
ਅਨੁਭਵੇਲਾ) ਭੋਗੋਨੀ ਆਕਾਂਕ੍ਸ਼ਾਥੀ ਮਾਂਡੀਨੇ ਸਮਸ੍ਤ ਚਿਂਤਾਜਾਲ਼ਨੇ ਛੋਡੀਨੇ ਪਣ ਚਿਂਤਾ ਰਹਿਤ
ਸ਼ੁਦ੍ਧਾਤ੍ਮਤਤ੍ਤ੍ਵਮਾਂ ਸਰ੍ਵ ਤਾਤ੍ਪਰ੍ਯਥੀ ਭਾਵਨਾ ਕਰਵੀ ਜੋਈਏ, ਏਵੁਂ ਤਾਤ੍ਪਰ੍ਯ ਛੇ. ੧੭੦.
ਵਲ਼ੀ (ਹਵੇ ਸ਼੍ਰੀਗੁਰੁ ਮੁਨਿਓਨੇ ਉਪਦੇਸ਼ ਆਪੇ ਛੇ ਕੇ ਮਨਨੇ ਮਾਰੀਨੇ ਪਰਬ੍ਰਹ੍ਮਨੁਂ ਧ੍ਯਾਨ
ਕਰੋ) :
ਭਾਵਾਰ੍ਥ :ਹੇ ਯੋਗੀ! ਤਾਰੀ ਆ ਕੇਵੀ ਦੁਰ੍ਬੁਦ੍ਧਿ ਛੇ ਕੇ ਭਵਰਹਿਤ ਅਨੇ ਸ਼ੁਭਾਸ਼ੁਭ
निर्मलगुण सहित हंसके समान उज्ज्वल परमात्माके शुद्ध भाव हैं, वे चिंताके बिना छोड़े नहीं
होते
तीर्थंकरदेव भी मुनि होके निश्चिंत व्रत धारण करते हैं, तभी परमहंस दशा पाते हैं, ऐसा
व्याख्यान जानकर देखे, सुने, भोगे हुए भोगोंकी वाँछा आदि समस्त चिंताजालको छोड़कर
परम निश्चिंत हो, शुद्धात्मकी भावना करना योग्य है ।।१७०।।
आगे श्रीगुरु मुनियोंको उपदेश देते हैं, कि मनको मारकर परब्रह्मका ध्यान करो
गाथा१७१
अन्वयार्थ :[योगिन् ] हे योगी, [तव का दुर्मतिः ] तेरी क्या खोटी बुद्धि है, जो
तू [भवकारणे व्यवहारे ] संसारके कारण उद्यमरूप व्यवहार करता है अब तू [प्रपंचैः रहितं ]
मायाजालरूप पाखंडोंसे रहित [यत् ब्रह्म ] जो शुद्धात्मा है, [तत् ज्ञात्वा ] उसको जानकर
[मनो मारय ] विकल्प
जालरूपी मनको मार
भावार्थ :वीतराग स्वसंवेदनज्ञानसे शुद्धात्माको जानकर शुभाशुभ विकल्प