Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Punjabi transliteration). Gatha-178,179,180,181 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
੫੦੪ ]ਯੋਗੀਨ੍ਦੁਦੇਵਵਿਰਚਿਤ: [ ਅਧਿਕਾਰ-੨ : ਦੋਹਾ-੧੭੮-੧੮੧
जेम इत्यादि जेम सहाविं णिम्मलउ यथा स्वभावेन निर्मलो भवति कोऽसौ
फ लिहउ स्फ टिकमणिः तेम तथा निर्मलो भवति कोऽसौ कर्ता सहाउ विशुद्धज्ञानरूपस्य
परमात्मनः स्वभावः भंतिए मइलु म मण्णि पूर्वोक्त मात्मस्वभावं कर्मतापन्नं भ्रान्त्या मलिनं
मा मन्यस्व
जिय हे जीव
किं कृत्वा मइलउ देक्खवि मलिनं द्रष्ट्वा कम् काउ
निर्मलशुद्धबुद्धैकस्वभावपरमात्मपदार्थाद्विलक्षणं कायमित्यभिप्रायः ।।१७७।।
अथ पूर्वोक्त भेदभावनां रक्त ादिवस्त्रद्रष्टान्तेन व्यक्ति करोति चतुष्कलेन
३०९) रत्तेँ वत्थेँ जेम बुहु देहु ण मण्णइरत्तु
देहिं रत्तिं णाणि तहँ अप्पु ण मण्णइ रत्तु ।।१७८।।
३१०) जिण्णिं वत्थिं जेम बुहु देहु ण मण्णइ जिण्णु
देहिं जिण्णिं णाणि तहँ अप्पु ण मण्णइ जिण्णु ।।१७९।।
३११) वत्थु पणट्ठइ जेम बुहु देहु ण मण्णइ णट्ठु
णट्ठे देहे णाणि तहँ अप्पु ण मण्णइ णट्ठु ।।१८०।।
३१२) भिण्णउ वत्थु जि जेम जिय देहहँ मण्णइ णाणि
देहु वि भिण्णउँ णाणि तहँ अप्पहँ मण्णइ जाणि ।।१८१।।
रक्ते न वस्त्रेन यथा बुधः देहं न मन्यते रक्त म्
देहेन रक्ते न ज्ञानी तथा आत्मानं न मन्यते रक्त म् ।।१७८।।
ਹਵੇ, ਪੂਰ੍ਵੋਕ੍ਤ ਭੇਦਭਾਵਨਾਨੇ ਰਕ੍ਤਾਦਿ ਵਸ੍ਤ੍ਰਨਾ ਦ੍ਰਸ਼੍ਟਾਂਤਥੀ ਚਾਰ ਗਾਥਾਸੂਤ੍ਰੋ ਦ੍ਵਾਰਾ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰੇ ਛੇ.
भावार्थ :यह काय शुद्ध-बुद्ध परमात्मपदार्थसे भिन्न है, काय मैली है, आत्मा
निर्मल है ।।१७७।।
आगे पूर्वकथित भेदविज्ञानकी भावना रक्त पीतादि वस्त्रके दृष्टांतसे चार दोहोंमें प्रगट
करते हैं
गाथा१७८८१
अन्वयार्थ :[यथा ] जैसे [बुधः ] कोई बुद्धिमान् पुरुष [रक्ते वस्त्रे ] लाल वस्त्रसे