Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Punjabi transliteration). Gatha-193 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
ਅਧਿਕਾਰ-੨ : ਦੋਹਾ-੧੯੩ ]ਪਰਮਾਤ੍ਮਪ੍ਰਕਾਸ਼: [ ੫੨੩
ध्यानं कर्तव्यमिति भावार्थः तथा चोक्त म्‘‘वैराग्यं तत्त्वविज्ञानं नैर्ग्रन्थ्यं वशचित्तता
जितपरिषहत्वं च पञ्चैते ध्यानहेतवः ।।’’ ।।१९२।।
अथ
३२४) परम-समाहि धरेवि मुणि जे परबंभु ण जंति
ते भव-दुक्खइँ बहुविहइँ कालु अणंतु सहंति ।।१९३।।
परमसमाधिं धृत्वापि मुनयः ये परब्रह्म न यान्ति
ते भवदुःखानि बहुविधानि कालं अनन्तं सहन्ते ।।१९३।।
जे ये केचन मुणि मुनयः ण जंति न गच्छन्ति कं कर्मतापन्नम् परबंभु परमब्रह्म
ਭਾਵੀਨੇ ਧ੍ਯਾਨ ਕਰਵੁਂ. ਵਲ਼ੀ ਕਹ੍ਯੁਂ ਛੇ ਕੇ :‘‘वैराग्यं तत्त्वविज्ञानं नैर्ग्रंथ्यं वशचित्तता जितपरिषहत्वं च पञ्चैते
ध्यानहेतवः ।। (ਅਰ੍ਥ:(੧) ਵੈਰਾਗ੍ਯ, (੨) ਤਤ੍ਤ੍ਵਵਿਜ੍ਞਾਨ, (੩) ਨੈਰ੍ਗ੍ਰਂਥ੍ਯ, (੪) ਚਿਤ੍ਤਨੁਂ ਵਸ਼ਪਣੁਂ ਅਨੇ
(੫) ਪਰਿਸ਼ਹਜਯ ਏ ਪਾਂਚ ਧ੍ਯਾਨਨਾ ਹੇਤੁਓ ਛੇ.) ੧੯੨.
ਵਲ਼ੀ (ਹਵੇ ਪਰਮਸਮਾਧਿਨੋ ਮਹਿਮਾ ਕਹੇ ਛੇ) :
ਭਾਵਾਰ੍ਥ :ਜੇ ਕੋਈ ਮੁਨਿਓ ਏਕ ਵੀਤਰਾਗ ਤਾਤ੍ਤ੍ਵਿਕ ਚਿਦਾਨਂਦਮਯ ਅਨੁਭੂਤਿਰੂਪ
जिसका ऐसे जो मनका वश होना, वह वीतराग निर्विकल्पसमाधिका सहकारी है, और बाईस
परीषहोंको जीतना, वह भी ध्यानका कारण है
ये पाँच ध्यानके कारण जानकर ध्यान करना
चाहिये ऐसा दूसरी जगह भी कहा है, कि संसार शरीरभोगोंसे विरक्तता, तत्त्वविज्ञान, सकल
परिग्रहका त्याग, मनका वश करना, और बाईस परिषहोंका जीतनाये पाँच आत्मध्यानके
कारण हैं ।।१९२।।
आगे परमसमाधिकी महिमा कहते हैं
गाथा१९३
अन्वयार्थ :[ये मुनयः ] जो कोई मुनि [परमसमाधिं ] परमसमाधिको [धृत्वापि ]
धारण करके भी [परब्रह्म ] निज देहमें ठहरे हुए केवलज्ञानादि अनंतगुणरूप निज आत्माको
[न यांति ] नहीं जानते हैं, [ते ] वे शुद्धात्मभावनासे रहित पुरुष [बहुविधानि ] अनेक प्रकारके
[भवदुःखानि ] नारकादि भवदुःख आधि व्याधिरूप [अनंतं कालं ] अनंतकालतक [सहंते ]
भोगते हैं
भावार्थ :मनके दुःखको आधि कहते हैं, और तनुसंबंधी दुःखोंको व्याधि कहते