२३४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
देवाधिदेव अरिहंत भगवाननी कहेली छे. ते अनुसार अहीं स्पष्टीकरण थाय छे. अहीं तो समय समयमां आत्मामां अने परमाणुमां पोतपोतानी थवावाळी पर्यायनो परद्रव्य कर्ता नथी, निमित्त कर्ता नथी ए वात सिद्ध करे छे. ‘होता स्वयं जगतपरिणाम, ज्ञाताद्रष्टा आतमराम’ एम अहीं सिद्ध करे छे. परनी क्रिया थाय तेनो आत्मा कर्ता नथी अने आत्मामां जे क्रिया थाय तेनो पर निमित्त कर्ता नथी. आवी वात छे.
घडानी पर्याय थाय तेमां कुंभारना परिणाम अनुकूळ छे. पण ते घडाना परिणाम पोताथी थया छे. घडानी पर्याय कुंभारना परिणामथी थई छे एम त्रणकाळमां सत्य नथी. कह्युं ने के -कुंभार घडो बनाववाना अहंकारथी भरेलो होवा छतां तेना व्यापारने अनुरूप माटीना घट-परिणाम के जे माटीथी अभिन्न छे अने माटीथी अभिन्न परिणतिमात्र क्रियाथी करवामां आवे छे तेने कुंभार करे छे एम प्रतिभासतुं नथी. अहाहा...! कुंभार घडो करे छे एम प्रतिभासतुं नथी. नामुं लखाय त्यां आ होशियार पुरुष सारा अक्षरे नामुं लखे छे एम प्रतिभासतुं नथी. भाई! अक्षरनी पर्याय अक्षरथी पोताथी थई छे, अंगुलिथी नहि, कलमथी नहि अने आत्माथी य नहि ज नहि. भगवान! आवो वीतरागनो अलौकिक मार्ग छे. कोईनी पर्यायमां कोई अन्यनो अधिकार नथी.
बंध अधिकारमां त्यांसुधी वात करी छे के कोई उपदेश देनार एम माने के माराथी बीजा मोक्ष पामे छे तो एम माननार ते मूढ छे. जीवना (मुक्तिना) वीतराग परिणामनो जीव पोते कर्ता छे. ते परिणाम पोताथी अभिन्न छे अने पोताथी अभिन्न परिणतिमात्र क्रियाथी करवामां आवे छे. तेने बीजाए (उपदेशके) कर्या छे एम प्रतिभासतुं नथी एम अहीं कहे छे.
आगळ कहे छे-‘तेवी रीते आत्मा पण अज्ञानने लीधे पुद्गलकर्मरूप परिणामने अनुकूळ पोताना परिणामने -के जे पोताथी अभिन्न छे अने पोताथी अभिन्न परिणतिमात्र क्रियाथी करवामां आवे छे तेने करतो प्रतिभासो, परंतु पुद्गलना परिणामने करवाना अहंकारथी भरेलो होवा छतां पण (ते आत्मा) पोताना परिणामने अनुरूप एवा पुद्गलना परिणामने-के जे पुद्गलथी अभिन्न छे अने पुद्गलथी अभिन्न परिणतिमात्र क्रियाथी करवामां आवे छे तेने-करतो न प्रतिभासो.’
जीव पोताना राग परिणामने करे छे. ए राग पुद्गलकर्मना बंधनमां निमित्त छे. पण ते पुद्गलकर्मना परिणामने जीव करे छे एम नथी. अहीं कहे छे के जीव पोताना पोताथी अभिन्न एवा राग परिणामने करे छे एम प्रतिभासो पण कर्मबंधननी