समयसार गाथा ८६ ] [ २३प
पर्यायने के जे पुद्गलथी अभिन्न छे तेने जीव करे छे एम न प्रतिभासो. आत्मा पुद्गलकर्मने बांधे वा कर्मनो नाश करे एम छे ज नहि. जीव पोताना परिणाममां रागनो नाश करीने वीतरागता प्रगट करे ते वखते कर्मनो नाश थई जाय छे, परंतु कर्मनाशनी ते क्रिया आत्माए करी एम नथी.
‘आत्मा पोताना ज परिणामने करतो प्रतिभासो; पुद्गलना परिणामने करतो तो कदी न प्रतिभासो.’ जीव रागनी क्रियाने करे छे, पण परनी क्रियाने करतो नथी. शरीर चाले त्यां अज्ञानी माने छे के हुं शरीरने चलावुं छुं. परंतु ए तेनी विपरीत मान्यता छे. श्री मोक्षमार्गप्रकाशकना चोथा अधिकारमां मिथ्यादर्शननुं स्वरूप कह्युं छे. त्यां लख्युं छे के -“ जीवना ज्ञानादिक वा क्रोधादिकनी अधिकता-हीनतारूप अवस्थाओ थाय छे तथा पुद्गल परमाणुओनी वर्णादि पलटावारूप अवस्थाओ थाय छे-ते सर्वने पोतानी अवस्था मानी तेमां ‘आ मारी अवस्था छे’ एवी ममकारबुद्धि करे छे वळी जीवने अने शरीरने निमित्तनैमित्तिक संबंध छे तेनाथी जे क्रिया थाय छे तेने पोतानी माने छे. पोतानो स्वभाव दर्शन-ज्ञान छे, तेनी प्रवृत्तिने निमित्तमात्र शरीरनां अंगरूप स्पर्शनादिक द्रव्य ईन्द्रियो छे. हवे आ जीव ते सर्वने एकरूप मानी एम माने छे के-हाथ वगेरे स्पर्श वडे में स्पर्श्युं, जीभ वडे में चाख्युं, नासिका वडे में सूघ्युं, नेत्र वडे में दीठुं, कान वडे में सांभळ्युं!” ईत्यादि अज्ञानीनी विपरीत मान्यता छे.
शरीरनी क्रिया, खावापीवानी क्रिया जे थाय ते जडनी क्रिया जडथी थाय छे. आंख आम मटकुं मारे ते बधी जडनी क्रिया जडथी थाय छे. परंतु अज्ञानी माने छे के ते क्रिया माराथी थाय छे. तेनी आ मान्यता जूठ छे. जीभ, कान आदि ईन्द्रियो जड छे. जीभथी स्वाद चाख्यो अने कानथी सांभळ्युं एम माने ते अज्ञान छे, मिथ्यादर्शन छे, केमके ईन्द्रियोथी ते जाणतो नथी, ज्ञाननी पर्यायथी जाणे छे. जाणवुं छे ते जीवनी ज्ञानपर्यायथी छे. ईन्द्रियो वडे हुं जाणुं छुं एम माने ते मिथ्यात्व छे. ईन्द्रियो निमित्त छे, पण निमित्तनो अर्थ शुं? परमां कांईन करे एनुं नाम निमित्त छे. अहा! वीतरागनो मार्ग बहु सूक्ष्म छे!
प्रश्नः– आवुं कोण माने?
उत्तरः– माने, न माने; पण वस्तुस्थिति आ ज छे. जेने सम्यक्स्वरूपनी जिज्ञासा छे ते अवश्य मानशे. शरीरथी स्त्रीना शरीरने में स्पर्श कर्यो एम माने पण ए तो जडनी क्रिया छे; जाणनार तो त्यां आत्मा छे, जड ईन्द्रिय नहि. भाई! समये समये जीवने मिथ्यात्वभाव केम थाय छे एनी आ वात छे. सुगंधने जाणे छे त्यां माने छे के नासिका वडे में सूंघ्युं. पण आ शरीर अने ईन्द्रियो तो जड छे, माटी छे. शुं