Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

एनाथी ते जाणे छे? ना, आत्मा ज्ञानथी जाणे छे; शरीर के ईन्द्रियोथी जाणतो नथी. अरे भाई! जड अने चेतनना बंनेना स्वभाव प्रगट भिन्न छे छतां अज्ञानी माने छे के नाक वडे में सूंघ्युं, पण ए जूठुं छे. वळी द्रव्यमन तथा ज्ञानने एकरूप मानी एम माने छे के में ‘मन वडे जाण्युं,’ पण स्मरण तो ज्ञाननी पर्याय छे. ते कांई जड मनथी थती नथी. वळी पोताने बोलवानी ईच्छा थाय त्यारे पोताना प्रदेशोने जेम बोलवानुं बने तेम हलावे छे त्यारे एकक्षेत्रावगाह संबंधथी शरीरनुं अंग पण हालतां भाषावर्गणारूप पुद्गलो वचनरूप परिणमे छे; ए बधाने एकरूप मानी आ एम माने छे के ‘हुं बोलुं छुं.’ पण आ बधुं एनुं अज्ञान छे.

अरे! अज्ञानीने आ चोवीस कलाकनी बिमारी छे. आत्मसिद्धिमां आवे छे के-

“आत्मभ्रान्ति सम रोग नहि, सद्गुरु वैद सुजाण
गुरुआज्ञा सम पथ्य नहि, औषध विचार ध्यान.”

सूक्ष्म वात छे, भाई! लोकोने बहारनी जडनी क्रियामां पोतानुं कर्तापणुं भासे छे ते रोग छे, बिमारी छे. ते स्वरूपनी समजण वडे ज दूर करी शकाय छे.

त्यारे कोई तो वळी एम कहे छे के- परनो कर्ता न माने ते दिगंबर नथी. अरे भाई! तुं शुं कहे छे? एम न होय, भाई! जीव परनो कर्ता त्रण काळमां नथी एम अहीं श्रेष्ठ दिगंबराचार्य सिद्ध करे छे. सम्यक्द्रष्टि चक्रवर्तीने छ खंडनुं राज्य होय छे, छन्नु हजार राणीओ होय छे. पण ए तो माने छे के रागनो एक कण पण मारो नथी. तो बहारना जड रजकणनी क्रिया मारी ए वात प्रभु? कयां कही? श्रेणीक राजा, भरत चक्रवर्ती क्षायिक समकिती हता. ते एम मानता के हुं परनी क्रियानो जाणनारो छुं, हुं तेनो कर्ता नथी. परनो कर्ता माने तो बे द्रव्योनी एकताबुद्धि थई जाय छे ते मोटी मूळमां ज भूल छे.

एक ने एक त्रण-एम कहे तो ते मूळमां भूल छे. पछी ए भूल आगळ बधे विस्तरे छे. तेम जडकर्मनो हुं कर्ता अने शरीरादि परद्रव्यनी क्रिया हुं करुं छुं एम जे माने तेने बे द्रव्यनी एकताबुद्धिनी मूळमां भूल छे. ते मिथ्यादर्शन छे, दुःखनो पंथ छे. भाई! सम्यग्दर्शन कोई अपूर्व चीज छे. सम्यग्दर्शन थाय तेने भवनो अंत आवी जाय छे. अनादि मिथ्यात्वनी गांठ तोडीने जेणे परथी भिन्न ज्ञातास्वरूप भगवान आत्माना अतीन्द्रिय आनंदनो अनुभव कर्यो छे ते सुखना-मोक्षना पंथे पडया छे. ए सिवाय आ कारखानां जे चाले, वेपारनी मोटी पेढीओ चाले-ईत्यादि बधी जडनी क्रिया थाय ते हुं करुं छुं एम जे माने ते मिथ्याद्रष्टि छे, ते भवना पंथे छे, दुःखना पंथे छे.

मोक्षमार्गप्रकाशकना चोथा अधिकारमां बहु सरस वात करी छे. त्यां कह्युं छे- “ शरीरनो संयोग थवा अने छूटवाथी जन्म-मरण होय छे-तेने पोतानां जन्म-मरण