समयसार गाथा ८६ ] [ २३७
मानी ‘हुं उपज्यो, हुं मरीश’ एम माने छे. वळी शरीरनी ज अपेक्षाए अन्य जीवोथी संबंध माने छे. जेमके -जेनाथी शरीर नीपज्युं तेने पोतानां मात-पिता माने छे, शरीरने रमाडे तेने पोतानी रमणी माने छे. शरीर वडे नीपज्यां तेने पोतानां दीकरा-दीकरी माने छे, शरीरने जे उपकारक छे तेने पोतानो मित्र माने छे तथा शरीरनुं बूरुं करे तेने पोतानो शत्रु माने छे. ईत्यादिरूप तेनी मान्यता होय छे. घणुं शुं कहीए? हरकोई प्रकार वडे पोताने अने शरीरने ते एकरूप ज माने छे.” आनाथी जुदी ज वात त्यां प्रवचनसारमां चरणानुयोग अधिकारमां आवे छे. दीक्षा माटे तैयार थयेलो वैराग्यप्राप्त समकिती एम कहे छे-“अहो आ पुरुषना शरीरनी जननीना आत्मा! आ पुरुषनो आत्मा तमाराथी जनित नथी एम निश्चयथी तमे जाणो. तेथी आ आत्माने तमे छोडो. जेने ज्ञानज्योति प्रगट थई छे एवो आ आत्मा आजे आत्मारूपी जे पोतानो अनादि जनक तेनी पासे जाय छे. अहो आ पुरुषना शरीरनी रमणीना आत्मा! आ पुरुषना आत्माने तुं रमाडतो नथी एम निश्चयथी तुं जाण. तेथी आ आत्माने तुं छोड. जेने ज्ञानज्योति प्रगट थई छे एवो आ आत्मा आजे स्वानुभूतिरूप जे पोतानी अनादि रमणी तेनी पासे जाय छे.” आवो समकिती अने मिथ्याद्रष्टिनी मान्यतामां आसमान-जमीन जेटलो फरक छे.
कोई मकानमां पांच-पचीस वरस रहे तो अज्ञानी मानवा लागे के आ मारुं मकान छे. ते में बनाव्युं छे. तेनी वृत्ति मकानना आकारे थई जाय छे. पण भाई! मकान कोण बनावे? आ आगममंदिर बन्युं ते कोणे बनाव्युं? ए तो पुद्गलोए बनाव्युं छे. संस्थानो वहिवट चाले तो कहे के माराथी चाले छे; पण एम छे नहि. ए तो बधी बोलवानी कथनपद्धति छे. संस्थानो वहिवट चाले ते आत्मा करतो नथी. आत्मा तेनुं ज्ञान करे, पण त्यां जडनी क्रिया जे थाय तेने आत्मा करतो नथी. ज्ञानी परद्रव्यने अंतरमां पोतानुं मानता नथी. समकितीने छ खंडना राज्यनो बहारमां संयोग होय पण ए राज्यनो हुं स्वामी छुं एम ते मानता नथी. पहेलां ७३मी गाथामां आवी गयुं के विकल्प द्वारा पण एवो निर्णय कर के रागद्वेषनो हुं स्वामी नथी. रागना स्वामीपणे सदा नहि परिणमनारो एवो हुं निर्मम छुं. भविष्यमां राग थशे, पण एना स्वामीपणे परिणमनारो हुं नथी. हुं तो निर्मम छुं. स्त्रीनो स्वामी, मकाननो स्वामी, राज्यनो स्वामी हुं नथी; ज्ञानी आम समजे छे. बहु संपत्ति होय ते लखपति कहेवाय छे ने. तो शुं आत्मा लखपति एटले जडनो पति छे? जेम भेंसनो पति पाडो होय तेम जडनो पति जड होय छे. बापु! आत्मा जडनो स्वामी नथी. पुण्यनो स्वामी पोताने माने ते पण जड छे. ४७ शक्तिओमां छेल्ली स्वस्वामी संबंधरूप शक्ति छे. धर्मी माने छे के हुं तो मारा शुद्ध द्रव्य-गुण अने निर्मळ पर्यायनो स्वामी छुं अने तेमारुं स्व छे. रागनो स्वामी थाय,