समयसार गाथा ८६ ] [ २३९
उत्पत्ति काळमां आत्मा ज्ञानना स्वपरप्रकाशक स्वभावना कारणे परने पण जाणे छे ज्ञानमां परने प्रकाशवानुं सामर्थ्य परने लईने नथी.
अहीं कहे छे के जे परिणमे छे ते कर्ता छे. आ शरीर परिणमित थाय तेनो कर्ता शरीर छे. पर जीवनी दया पाळवाना भाव थाय ते जीवनुं परिणमन छे अने तेनो कर्ता जीव छे. अने ते दयाना परिणाम कर्म छे.
परिणमे ते कर्ता छे अने परिणाम कर्म छे; कर्म एटले कार्य छे. ‘तु’ अने ‘या परिणति सा क्रिया’ जे परिणति छे ते क्रिया छे. प्रथमनी पर्याय पलटीने वर्तमान पर्याय थई ते क्रिया छे. ‘त्रयम् अपि’ ए त्रणेय ‘वस्तुतया भिन्नम् न’ वस्तुपणे भिन्न नथी. पर्यायद्रष्टिथी त्रण भेद पडे छे, वस्तुपणे भेद नथी. समयसार कळशटीकाना ४९मा श्लोकमां तो एम कह्युं छे के द्रव्य कर्ता अने तेना परिणाम ए तेनुं कर्म ए पण उपचारथी छे. अने द्रव्य परनो कर्ता तो उपचारथी पण नथी. , व्यवहारथी पण नथी. पोताना ज्ञान परिणाम ते कार्य अने तेनो कर्ता आत्मा एवो भेद उपचार छे. निश्चयथी तो परिणाम अने परिणामी अभेद छे.
अहीं तो परथी भिन्न पाडवानी वात छे एटले एम कह्युं के जे परिणमे छे ते कर्ता अने जे परिणाम छे ते कर्म छे. खरेखर तो जे परिणमे छे ते पर्याय छे, द्रव्य तेनुं कर्ता नथी. परिणतिनो कर्ता परिणति पोते छे, केमके एक समयमां जे परिणति थई ते पोताना षट्कारकथी थई छे. परिणति थई ते द्रव्य-गुणना आलंबनथी थई नथी, परना आलंबनथी पण थई नथी. शुद्ध परिणति हो के अशुद्ध परिणति हो, ते समय समयना पोताना षट्कारकथी थाय छे. ते क्रियानुं कारण द्रव्य नथी. परिणतिनुं उपादान कारण परिणति पोते छे; परिणति ध्रुवथी थइ छे एम नथी. परिणति परिणतिथी थई छे.
अहा! परिणमे ते कर्ता, परिणाम ते कर्म अने परिणति ते क्रिया-एम त्रण भेद पाडवा ते उपचार छे. त्यारे लोको व्रत, तप, भक्ति अने ब्रह्मचर्य पाळवुं एमां धर्म माने छे, परंतु ए मान्यता तो मिथ्यात्व छे. व्रतादि छे ते आस्रव छे. आस्रवनुं पालन करवुं ते मिथ्यात्व छे. रागने पाळवो-रागनी रक्षा करवी ते मिथ्यात्व छे. वर्तमानमां आ बधी खूब गडबड चाले छे. पण भाई! तत्त्व तो आ छे. परिणति ते क्रिया, परिणमे ते कर्ता अने परिणाम ते कर्म- ए त्रणेय वस्तु छे, वस्तुथी भिन्न नथी.
परनुं कार्य पोताथी थाय अने पोतानुं कार्य परथी थाय ए वस्तुस्वरूप नथी. कहे छे ने के खेडूतो खेतीनां काम करे छे; पण एम छे नहि. खेतीनां काम तो एना कारणे थाय छे, जीवथी ते थतां नथी. खेतीनी पेदाश जीव करे छे एम छे ज नहि. आत्मामां आनंदनी उत्पत्ति थाय ते आत्मानी पेदाश छे. खेतीनी पेदाश कोण करे? खेतीनी पेदाश हुं करुं छुं एम माने ते मिथ्याद्रष्टि छे, ए दुःखना भाव छे.