२४० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
‘द्रव्यद्रष्टिए परिणाम अने परिणामी अभेद छे, अने पर्यायद्रष्टिए भेद छे. शुद्ध परिणाम हो के अशुद्ध परिणाम हो, रागना परिणाम हो के अरागना परिणाम हो, द्रव्यद्रष्टिथी परिणाम अने परिणामी अभेद छे, अने पर्यायद्रष्टिथी भेद छे.
श्री पंचास्तिकायनी गाथा १पमां आवे छे के ज्ञान, दर्शन, चारित्र, आनंद आदि बधा गुणो ध्रुव छे, परंतु पर्यायद्रष्टिए गुणो परिणमे छे एम कहेवाय छे. द्रव्यद्रष्टिथी गुण गुणमां ध्रुव छे अने पर्यायद्रष्टिथी गुण परिणमे छे. आ बधां पडखाने जाणी यथार्थ निर्णय वडे पर्यायबुद्धि छोडीने द्रव्यबुद्धि करे तो क्षणमां सम्यग्दर्शन प्रगट थाय छे. पर्यायबुद्धि छे ते मिथ्याद्रष्टि छे. प्रवचनसार गाथा ९३मां कह्युं छे के –‘पज्जयमूढा हि परसमया’ पर्यायमूढ जीवो परसमय छे.
त्यारे कोई वांधो ले छे के पर्याय तो पोतानी छे. तेने माने ते मूढ केम कहेवाय? तेने कहे छे- अरे भाई! एक समयनी पर्यायने पोतानुं स्वरूप माने ते परसमय छे केमके पर्याय जेटलो ज त्रिकाळी आत्मा नथी. पर्याय जेटलो आत्माने माने अने त्रिकाळी द्रव्यने न माने ते पर्यायमां मूढ छे, ते परसमय छे, मिथ्याद्रष्टि छे. समकिती जीवनी प्रशंसा करतां नाटक समयसारमां बनारसीदास कहे छे के-
समकितीने पर्यायबुद्धि होती नथी. धर्मात्मा तो स्वरूपना लक्षना लक्षपति छे. धनादि संपत्तिना स्वामी लखपति ए वात नहि. निज चैतन्यस्वरूप लक्ष्मीनुं जेने लक्ष छे ते लक्षपति छे. अजाची लक्षपति छे एटले परथी पोतानुं कार्य थाय एम मानता नथी. अहाहा..! गृहस्थाश्रममां रहेला समकिती आवा होय छे. मुनिपणानी तो शी वात! अहो मुनिपणुं! धन्य क्षण! धन्य अवतार! मुनिपणुं ए तो साक्षात् चारित्रनी आनंददशा! लोको सम्यग्दर्शन विना व्रतादि ग्रहीने चारित्र माने छे, पण एमार्ग नथी.
अहीं कहे छे-द्रव्यद्रष्टिए परिणाम अने परिणामी अभेद छे अने पर्यायद्रष्टिए भेद छे. ‘भेदद्रष्टिथी तो कर्ता, कर्म अने क्रिया त्रण कहेवामां आवे छे पण अहीं