समयसार गाथा ८६ ] [ २४१
अभेदद्रष्टिथी परमार्थ कह्यो छे के कर्ता कर्म अने क्रिया -त्रणेय एक द्रव्यनी अभिन्न अवस्थाओ छे, प्रदेशभेदरूप जुदी वस्तुओ नथी.’ परना प्रदेश भिन्न छे अहीं ए अपेक्षाए कथन छे. निश्चयथी पर्यायना प्रदेश भिन्न कहेवामां आवे छे. अहीं तो परना प्रदेशथी पोताना प्रदेश भिन्न सिद्ध करवानी वात छे.
निश्चयथी तो पर्यायनुं क्षेत्र भिन्न छे अने ध्रुव द्रव्यनुं क्षेत्र भिन्न छे. जेटला क्षेत्रथी पर्याय ऊठे छे एटलुं क्षेत्र ध्रुवथी भिन्न गणवामां आव्युं छे. बहु सूक्ष्म वात छे, भाई! पोतानी केवळज्ञाननी पर्याय, पोतानी सम्यग्दर्शननी पर्यायनुं क्षेत्र द्रव्यना क्षेत्रथी भिन्न छे. बे वच्चे भेद छे. द्रव्यनो धर्म अने पर्यायनो धर्म बन्ने भिन्न छे, स्वतंत्र छे. समयसारना संवर अधिकारमां कह्युं छे के- विकल्पनुं क्षेत्र भिन्न छे अने स्वभावनुं क्षेत्र भिन्न छे. विकल्प चीज भिन्न छे अने भगवान आत्मा भिन्न छे. त्यां तो एटली वात छे पण बीजे एम वात आवे छे के निर्मळ परिणतिनुं क्षेत्र भिन्न, तेनी शक्ति भिन्न; पर्यायनो कर्ता पर्याय, कर्म पर्याय, साधन पर्याय अने तेनो आधार पण ते पर्याय. अहो! आवुं अति सूक्ष्म भेदज्ञाननुं स्वरूप छे.
समयसार कळश १३१ मां कह्युं छे के-
जे कोई सिद्ध थया छे ते भेदविज्ञानथी सिद्ध थया छे; जे कोई बंधाया छे ते एना ज अभावथी बंधाया छे. भेदज्ञानना अभावथी बंधाया छे एम कह्युं छे पण कर्मना कारणे बंधाया छे एम नथी कह्युं. तेम व्यवहारना रागथी सिद्धपद पाम्या छे एम नथी पण एनाथी भिन्नपणानुं भेदज्ञान करीने मुक्ति पाम्या छे.
लोकोने सत्य वात सांभळवा मळी नथी एटले ‘चोर कोटवाळने दंडे’ ए न्याये सत्य वातने जूठी ठराववा लाग्या छे; शुं थाय? अहीं कहे छे के -अज्ञानभावे विकारना परिणामनो कर्ता आत्मा छे अने ज्ञानभावे सम्यग्दर्शनादि निर्मळ पर्यायनो कर्ता आत्मा छे. कर्ता अने कर्म बे भिन्न पाडवा ते भेदकथन छे, उपचार छे. पर्यायनो कर्ता आत्मा अने पर्याय एनुं कर्म एम भेद करवो ते उपचार छे. आत्मा रागनो कर्ता अने परनो कर्ता-ए तो कयांय रही गयुं. भाई! आवो भेदज्ञाननो अति सूक्ष्म मार्ग छे.
अहाहा...! ए भेदज्ञाननुं फळ शुं? तो कहे छे अनंत ज्ञान अने अनंत आनंद पर्यायमां प्रगटे ते एनुं फळ छे. श्रीमदे कह्युं छे ने के-
भेदज्ञानना फळमां सादि, अनंतकाळ जीव अनंत सुख-समाधिदशामां रहेशे.