२४२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
भूतकाळथी भविष्यनो काळ अनंतगुणो अधिक छे. ते अनंतकाळ पर्यंत जीव अनंत सुखमां समाधिस्थ रहेशे ए भेदज्ञाननुं फळ छे. अहो भेदज्ञान!
नथी. जेने निश्चयना भानपूर्वक अभेदरत्नत्रय प्रगट थयेल छे ते ज्ञानीने जे भेदरत्नत्रयनो विकल्प सहचरपणे छे तेने आरोप आपीने व्यवहारथी साधन कह्यो छे. भेदरत्नत्रयना रागनो अभाव करीने मुक्ति पामशे ए अपेक्षाए तेने परंपरा कारण कह्युं छे. बाकी व्यवहारथी परंपरा मुक्ति थशे ए व्यवहारनयनुं कथन छे अने ते असत्यार्थ छे.
मुक्तिनुं साक्षात् कारण तो अभेदरत्नत्रय छे केमके अभेदरत्नत्रयनी पर्यायनो व्यय थई केवळज्ञाननी पर्याय उत्पन्न थाय छे. खरेखर तो अभेदरत्नत्रयथी केवळज्ञान थयुं एम कहेवुं ए पण व्यवहार छे. तथा त्रिकाळी शुद्ध द्रव्यने तेनुं कारण कहेवुं ए पण उपचार छे. केवळज्ञाननी पर्यायनुं वास्तविक कारण केवळज्ञाननी पर्याय ज छे, द्रव्य-गुण नहि, पूर्वनी अभेदरत्नत्रयनी पर्याय पण नहि अने भेदरत्नत्रयनो राग पण नहि. बहु झीणी वात, प्रभु! भरतक्षेत्रमां भगवाननी गेरहाजरी छे अने लोको व्यवहारथी धर्म थाय एम मानवा लाग्या छे. शुं थाय भाई? संतोनो अने वीतरागनो ए अभिप्राय नथी.
अहीं कहे छे-कर्ता, कर्म क्रिया-त्रणेय एक द्रव्यनी अभिन्न अवस्थाओ छे, प्रदेशभेदरूप जुदी वस्तु नथी. असंख्य प्रदेशमां पर्याय उत्पन्न थाय छे, प्रदेशभेद नथी. बीजे एम आवे छे के पर्यायनुं क्षेत्र भिन्न अने ध्रुवनुं क्षेत्र भिन्न छे. ए तो द्रव्य-पर्यायनी परस्पर भिन्नतानी वात छे. धर्म अने धर्मी बन्ने निरपेक्ष छे एम सिद्ध करवानी वात छे. परंतु अहीं तो स्वद्रव्य-परद्रव्यनी भिन्नतानी वात छे. द्रव्यना परिणाम द्रव्यथी अभिन्न छे, परद्रव्यथी भिन्न छे; परद्रव्य एमां कांई करतुं नथी.
निमित्तना, व्यवहारना अने क्रमबद्धपर्यायना लोकोने वांधा छे पण क्रमबद्धपर्याय ए तो वस्तुनी स्थिति छे. एक पछी एक जे समये जे पर्याय थवानी होय तेमां द्रव्य पण फेरफार करी शकतुं नथी. क्रमबद्धपर्याय थाय तेने द्रव्य जाणे पण तेमां फेरफार द्रव्य करी शकतुं नथी. आत्मा अनंत शक्तिओनो पिंड छे. शक्तिवान द्रव्य शुद्ध छे, तेना गुणो शुद्ध छे. अने तेनी द्रष्टि थतां पर्याय पण क्रमसर निर्मळ परिणमे छे. शक्तिना वर्णनमां विकारी परिणामनी वात नथी केमके अशुद्धता थाय एवी द्रव्यमां कोई शक्ति ज नथी. गुणो अक्रमे वर्ते छे अने पर्यायो क्रमे वर्ते छे. शक्तिवान द्रव्यनी जेने द्रष्टि थाय तेने निर्मळ पर्यायो क्रमसर एक पछी एक थया ज करे छे.
अहीं एम कहे छे के कर्ता, कर्म, क्रिया-त्रणेयना प्रदेशो अभिन्न छे, ते त्रण प्रदेशभेदरूप जुदी वस्तुओ नथी. आ प्रमाणे परद्रव्यथी भिन्नता कही.