समयसार गाथा ८६ ] [ २४३
फरी पण कहे छे केः-
‘एकः परिणमति सदा’ वस्तु एक ज सदा परिणमे छे, ‘एकस्य सदा परिणामः जायते’ एकना ज सदा परिणाम थाय छे अर्थात् एक अवस्थाथी अन्य अवस्था एकनी ज थाय छे. अने ‘एकस्य परिणतिः स्यात्’ एकनी ज परिणति-क्रिया थाय छे; ‘यत’ कारण के‘एकम् अनेकम् न स्यात्’ एक द्रव्य अनेक द्रव्यरूप थाय नहि.
‘एक वस्तुना अनेक पर्यायो थाय छे; तेमने परिणाम पण कहेवाय छे अने अवस्था पण कहेवाय छे.’
प्रत्येक आत्मा अने प्रत्येक परमाणु समयसमयमां अनेक पर्याययुक्त छे. एटले के प्रत्येक द्रव्य पोतानी अनेक पर्यायथी युक्त छे. माटे अन्य द्रव्य तेनी पर्याय करे एम नथी. प्रत्येक द्रव्यमां अनंत गुणो छे. तेथी एक समयमां तेनी पर्यायो पण अनंत होय छे. माटे अनंत पर्यायरहित कोई द्रव्य होतुं नथी. जेम आत्मद्रव्य अनेक पर्याययुक्त छे तेम अन्य द्रव्य पण अनेक पर्याययुक्त छे. तो पछी अनेक पर्याययुक्त बीजा द्रव्यनी पर्यायने आत्मा केम करे?
द्रव्य अनेक पर्याययुक्त होय छे. तेने परिणाम पण कहे छे. आत्मा पोतानी पर्याय प्रसिद्ध करे तेने परिणाम कहेवाय छे. अहीं संसार पर्यायनी ज वात नथी. दरेक आत्मा शुद्ध के अशुद्ध अनंत पर्याययुक्त होय छे. अशुद्ध वखते पोतानी अशुद्ध अनंत पर्याययुक्त आत्मा होय छे. तो ते अशुद्ध पर्यायने अन्य द्रव्य केम करे?
पर्यायने अवस्था पण कहे छे. प्रत्येक द्रव्य पोताना अनंत गुणनी अवस्थारूपे परिणमन करे छे. पर्यायने परिणाम पण कहे छे, अवस्था पण कहे छे. हवे कहे छे- ‘तेओ संज्ञा, संख्या लक्षण, प्रयोजनादिकथी जुदा जुदा प्रतिभासे छे तोपण एक वस्तु ज छे, जुदा नथी.; एवो ज भेदाभेदस्वरूप वस्तुनो स्वभाव छे.’
द्रव्यनुं नाम अने पर्यायनुं नाम जुदुं छे माटे संज्ञाभेदे भेद छे. द्रव्य एक अने पर्याय अनेक-एम संख्याभेद छे. द्रव्य त्रिकाळ रहे छे अने पर्याय एक समय, माटे लक्षणभेद छे. अने द्रव्य-पर्यायनुं प्रयोजन भिन्न छे, माटे प्रयोजनथी पण भेद छे. तोपण एक वस्तु ज छे. द्रव्यपर्याय एक वस्तु ज छे. एवो ज भेदाभेदस्वरूप वस्तुनो स्वभाव छे. आत्मा अभेदस्वरूप छे एम शास्त्रमां आवे छे. अहीं भेदाभेद स्वरूप लीधुं छे.