Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२४४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

समयसारनी सातमी गाथामां लीधुं छे के वस्तु भेदाभेदस्वरूप छे. समजाववामां जे भेद पडे छे ते अंदर भेद छे. परथी भिन्न पाडवानी अपेक्षाए अभेद कहेवाय पण वस्तुमां गुण अने पर्यायनो भेद छे. अभेदनी द्रष्टिए द्रव्य-गुण-पर्याय अभेद छे. भेदथी जुओ तो त्रणनो भेद छे. वस्तु भेदाभेदस्वरूप छे. कई अपेक्षाए कथन छे ते यथार्थ जाणवुं जोईए. एकांते अभेद कहो तो गुण-पर्यायनो भेद सिद्ध नहि थाय अने एकांत भेद कहो तो अभेद सिद्ध नहि थाय. माटे भेदाभेदस्वरूप वस्तुनो स्वभाव छे. सातमी गाथाना भावार्थमां छेल्ले कह्युं छे के- “वीतराग थया बाद भेदाभेदरूप वस्तुनो ज्ञाता थई जाय छे.”

वळी त्यां कह्युं छे-“अहीं कोई कहे के पर्याय पण द्रव्यना ज भेद छे, अवस्तु तो नथी; तो तेने व्यवहार केम कही शकाय? तेनुं समाधानः- ए तो खरुं छे पण अहीं द्रव्यद्रष्टिथी अभेदने प्रधान करी उपदेश छे. अभेदद्रष्टिमां भेदने गौण कहेवाथी ज अभेद सारी रीते मालूम पडी शके छे, तेथी भेदने गौण करीने भेदने तेने व्यवहार कह्यो छे. अहीं एवो अभिप्राय छे के भेदद्रष्टिमां निर्विकल्प दशा नथी थती अने सरागीने विकल्प रह्या करे छे; माटे ज्यां सुधी रागादिक मटे नहि त्यां सुधी भेदने गौण करी अभेदरूप निर्विकल्प अनुभव कराववामां आव्यो छे.”

जुओ आ एकांत! एकांत अभेद ए ज सम्यग्दर्शननो विषय छे. अनेकांत लक्षमां होवा छतां सम्यक् एकांत जे त्रिकाळ शुद्ध द्रव्य अभेद एकरूप अखंडानंदरूप चैतन्य भगवान छे ए ज द्रष्टिनो विषय छे. समयसारनी १४ मी गाथामां पण सम्यक् एकांतनुं कथन आवे छे के- “जे पोते एकांत बोधरूप (ज्ञानरूप) छे एवा जीवस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां संयुक्तपणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे.” एकांत ज्ञायकस्वरूप भगवान आत्मानी द्रष्टि थया विना सम्यग्दर्शन थतुं नथी. अनेकांत उपर द्रष्टि रहे एटले के द्रव्य अने पर्याय बन्ने उपर द्रष्टि रहे तो सम्यग्दर्शन न थाय.

वस्तु अभेद छे एम वात आवे ते अपेक्षाथी कथन छे. परथी भेद छे माटे पोतानी अपेक्षाए अभेद कह्युुं छे. त्यां सातमी गाथामां तो एम कह्युं के अभेद जे त्रिकाळी वस्तु छे तेमां पर्याय नथी, ज्ञान नथी, दर्शन नथी, चारित्र नथी, भेद व्यवहार पण नथी. ए तो अभेदनी द्रष्टि कराववाना प्रयोजनथी पर्यायादि नथी एम कह्युं छे. वस्तु तो भेदाभेदस्वरूप छे. वीतराग थया बाद भेदाभेदनो ज्ञाता थई जाय छे. त्यारे द्रव्यने जाणे छे, पर्यायने पण जाणे छे. पण ज्यां सुधी रागादिक मटे नहि त्यां सुधी भेदने गौण करीने अभेदरूप निर्विकल्प अनुभव कराववामां आव्यो छे.

रागी प्राणीने भेद उपर लक्ष जाय तो राग ज थाय. भेदनुं ज्ञान तो केवळज्ञानीने पण छे. केवळी भगवान भेद-अभेद बधुं जाणे छे. भेदने जाणवुं ते रागनुं कारण नथी, पण रागी प्राणीने भेदनुं लक्ष थतां राग थाय छे.