समयसार गाथा ८६ ] [ २४प
अभेदद्रष्टिमां भेद मालूम पडतो नथी माटे अभेदनी द्रष्टिमां भेद नथी एम कह्युं छे. अंदर गुण-पर्यायनो भेद छे तो खरो, पण अभेदनी द्रष्टिमां भेद मालूम पडतो नथी. माटे भेदने गौण करीने-अभाव करीने नहि -व्यवहार कहेल छे. एकांत अने अनेकांतना भारे गोटा ऊठया छे. अहीं तो अभेदद्रष्टि कराववा एकांत भणी लई जाय छे. पर्याय अने भेदनुं लक्ष छोडाववा भेदने गौण करी अभूतार्थ कहेल छे.
त्यारे कोई कहे के भेदद्रष्टिथी अभेदद्रष्टि थाय अने अभेदनी द्रष्टिथी पण अभेदनुं लक्ष थाय एम अनेकांत करवुं जोईए. तेने कहे छे के भाई! एवुं अनेकांतनुं स्वरूप नथी. भेदद्रष्टिमां निर्विकल्प दशा थती नथी. सरागीने भेदना लक्षे विकल्प थाय छे. भेदने जाणवाथी राग थाय एम नहि. पण सरागी प्राणी छे तेने भेद उपर लक्ष जाय तो राग थाय छे. तेथी निर्विकल्प दशा कराववा माटे त्रिकाळी अभेद एकरूप चीजनी द्रष्टि करो एम सम्यक् एकांत कह्युं छे.
अभेदद्रष्टिथी सम्यग्दर्शन थाय अने भेदद्रष्टिथी न थाय एनुं नाम अनेकांत छे. लोकोए एकांत-अनेकांतने समज्या विना मोटी गडबड करी दीधी छे. जेने सम्यग्दर्शन प्रगट करवुं होय तेणे अभेद उपर द्रष्टि मूकवी जोईए. भेद अने पर्याय होवा छतां एकांत अभेदनी द्रष्टि करवाथी सम्यग्दर्शन प्रगट थाय छे. कथंचित् भेदना लक्षथी अने कथंचित् अभेदना लक्षथी सम्यग्दर्शन थाय एम छे ज नहि. ए अनेकांत नथी, ए तो फुदडीवाद छे.
जुओ, शुं कह्युं? वस्तुनुं स्वरूप तो भेदाभेद छे. वीतराग थया पछी अभेदने जाणे, भेदने पण जाणे. पण सरागी प्राणीने भेद उपर लक्ष जाय तो राग थाय छे. माटे भेदने गौण करीने एक अभेद उपर द्रष्टि स्थापित करवी. आवो ज वीतरागनो मार्ग छे. श्रीमद् राजचंद्रजीए पण कह्युं छे के-अनेकांत पण सम्यक् एकांत एवा निजपदनी प्राप्ति सिवाय अन्य हेतुए उपकारी नथी. भाई! अंदर त्रिकाळी शुद्ध अभेद चीज पडी छे. एना उपर द्रष्टि आप्या विना कोई व्रतादिना विकल्पथी, रागथी, भेदथी के निमित्तथी सम्यग्दर्शन प्रगट थाय एम त्रणकाळमां बनतुं नथी. वळी श्रीमद् कहे छे -
अनेकांतद्रष्टियुक्त एकांतनी जे सेवा करे छे एटले के पर्यायादि भेदनुं ज्ञान करीने जे अभेदनुं सेवन करे छे ते सम्यक्पणे सर्वथी सर्व प्रकारे हुं भिन्न छुं एम जाणे छे. एक केवळ शुद्ध चैतन्यस्वरूपमात्र एकांत शुद्ध अनुभवरूप हुं छुं, हुं एकांत शुद्ध आनंदस्वरूप छुं. जुओ, दुःख छे, अशुद्धता छे ए वात करी नथी. सम्यग्दर्शनमां सम्यक् एकांत होय छे. अहाहा..! अचिंत्य सुख परमोत्कृष्ट सुखमात्र एकांत शुद्ध अनुभवरूप हुं छुं. त्यां निक्षेप शुं? विकल्प शुं? भय शुं? खेद शुं? बीजी अवस्था शुं? हुं तो मात्र निर्विकल्प निजस्वरूपमय उपयोग कर्ता छुं. तन्मय था तो शांति, शांति, शांति.