२४६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
पर्यायमां अशुद्धता छे अने भेद छे ए बधुं अहीं उडाडी दीधुं छे. द्रष्टिनो विषय आम एकांत होय छे.
बे कारणथी कार्य थाय एम नथी. पोताना स्वरूपना लक्षथी ज सम्यग्दर्शन प्रगट थाय छे. कारण एक ज छे; परंतु प्रमाणज्ञानमां बीजुं निमित्त कोण छे एनुं ज्ञान कराववा उपचारथी एने कारण कहेवाय छे.
नयचक्रमां आवे छे के-शिष्ये प्रश्न कर्यो के प्रभु! निश्चयमां तो एकलुं द्रव्य आवे छे, ज्यारे प्रमाणनो विषय तो द्रव्य अने पर्याय बन्ने छे. माटे निश्चय करतां प्रमाण पूज्य छे? तेना जवाबमां कह्युं के -नहि, प्रमाण पूज्य नथी. तेमां पर्यायनो निषेध न आवे ते पूज्य नथी. आवो मार्ग छे.
वळी कहे छे केः-
‘न उभौ परिणमतः खलु’ बे द्रव्यो एक थईने परिणमतां नथी, ‘उभयोः परिणामः न प्रजायेत’ बे द्रव्योनुं एक परिणाम थतुं नथी अने ‘उभयोः परिणतिः न स्यात्’ बे द्रव्योनी एक परिणति -क्रिया थती नथी.
शुं कहे छे? आत्मामां जे अशुद्ध राग-द्वेषादि परिणाम थाय ते पोताथी पण थाय अने कर्मथी पण अशुद्धरूप चेतना थाय एम नथी. बे द्रव्योनी एक परिणति होती नथी. कर्मथी विकार थाय छे ए मान्यता खोटी छे. पोतानुं अशुद्ध परिणमन पोताथी थाय छे. कर्म पण (जीवनुं) अशुद्ध परिणमन करी दे छे एम नथी. जीवद्रव्य पोतानी शुद्ध चेतनारूप अथवा अशुद्ध चेतनारूप व्याप्यव्यापकभावथी परिणमे छे. पुद्गलद्रव्य पण पोताना अचेतनलक्षण परिणामरूप अथवा ज्ञानावरणादि कर्मरूपे परिणमे छे. वस्तु तो आम छे. पण जीवद्रव्य अने पुद्गलद्रव्य बन्ने मळीने अशुद्ध चेतनारूप परिणमे छे एम नथी.
श्री जयसेनाचार्यनी टीकामां एम आव्युं छे के -जेम मातापिता विना पुत्र थतो नथी तेम आत्मा अने कर्म विना अशुद्धता थती नथी. परंतु ए तो त्यां प्रमाणनुं ज्ञान कराववा एम वात करी छे. अहीं कहे छे के जेम आत्मा अशुद्धतारूपे व्याप्यव्यापकभावथी परिणमे छे तेम पुद्गल पण आत्माने अशुद्धतारूपे परिणमावी दे छे एम कोई माने तो ते एम नथी. जीवद्रव्य अने पुद्गलद्रव्य बन्ने मळीने एक पर्यायपणे परिणमे एम छे नहि. जडकर्म कर्मनी पर्यायने करे अने जीवना अशुद्ध परिणामने पण करे एम छे नहि.
लोको मोटा वांधा उठावे छे. पण अहीं कहे छे के ज्ञानावरणादि कर्म जीवमां कांई करतुं नथी. विकार पोतानी पर्यायथी पोताना कारणे थाय छे. पोतानी षट्कारकनी