समयसार गाथा ८६ ] [ २४९
करे; जेवी रीते जीव द्रव्य पोताना अशुद्ध चेतनारूप राग-द्वेष-मोहपरिणामने व्याप्यव्यापकपणे करे तेवी ज रीते ज्ञानावरणादि कर्मपिंडने व्याप्यव्यापकपणे करे. उत्तर आम छे के द्रव्यने अनंत शक्तिओ तो छे परंतु एवी शक्ति तो कोई नथी के जेनाथी, जेवी रीते पोताना गुण साथे व्याप्यव्यापकपणे छे तेवी ज रीते परद्रव्यना गुण साथे पण व्याप्यव्यापकपणे थाय.”
व्याप्यव्यापक थईने भाषापणे परिणमे छे, जीव तेमां व्याप्यव्यापकपणे नथी. अरे भगवान! पोतानी पर्याय स्वयंसद्धि पोताथी थाय छे अने परनी पर्याय परथी थाय छे एम जेने निर्णय नथी तेने आत्मा स्वतंत्र आनंदकंद प्रभु कर्मना उदयना संबंधरहित छे (अर्थात् राग रहित छे) ए केम बेसे? द्रव्यने निमित्तनो संबंध नथी; पर्यायमां निमित्तनो संबंध छे. पण द्रव्य तो ते पर्यायथी पण भिन्न छे. आवी वात काने पण भाग्य विना पडती नथी. आ तो दिव्यध्वनिमां आवेली परम सुखनी प्राप्तिनी वात छे.
समये समये जीव जीवनी पर्यायथी युक्त छे अने जड जडनी पर्यायथी युक्त छे. आत्मा पोतानी शुद्ध के अशुद्ध पर्यायथी युक्त छे अने पर पदार्थ पोतानी शुद्ध के अशुद्ध पर्यायथी युक्त छे. आम छे तो एकबीजानी पर्यायने करी दे एम होई शके नहि.
कर्म करे, कर्म करे-एम जैनमां पण मोटी गडबड चाले छे. पण पूजानी जयमालामां तो स्पष्ट आवे छे-
जड कर्म तेनी पोतानी सत्तामां रहे छे. ते मारी सत्तामां आवे तो मने नुकशान करे. पण कर्म मारी सत्तामां तो आवतां नथी. अहाहा...! मारी पर्यायने कर्मनो उदय अडतो पण नथी. एकनी सत्ताने बीजानी सत्ता अडती नथी. आ तो त्रिलोकनाथ सर्वज्ञदेव परमात्माए जोयेली वात छे. दरेक द्रव्य पोतानी पर्यायथी युक्त स्वयंसिद्ध वस्तु छे. अरे भाई! कया समये द्रव्य पोतानी अनंत पर्यायथी युक्त नथी?
संतोए आगमचक्षु कह्या छे. आ आंख छे ए तो जड छे. सर्व जीव ईन्द्रियचक्षु छे, भगवान केवळी ज्ञानचक्षु छे अने छद्मस्थ ज्ञानी आगमचक्षु छे. भाई! आ इन्द्रियप्रत्यक्षनी चीज नथी.
अहीं द्रव्यथी पर्याय भिन्न छे ए वात नथी. द्रव्यनी पर्याय द्रव्य पोते करे छे,