Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२प० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

पर निमित्त नहि -एम अहीं सिद्ध करवुं छे. निश्चयथी तो पर्याय द्रव्यथी भिन्न छे. परमात्मप्रकाशनी गाथा ६८ मां कह्युं छे के जीव बंध अने मोक्षनी पर्यायने करतो नथी. पर्याय पर्यायथी पोताथी थाय छे. अहाहा...! जे (ज्ञाननी) पर्याय द्रव्यने जाणे ते पर्याय द्रव्यमां जती नथी अने द्रव्य पर्यायमां जतुं नथी. पर्याय लोकालोकने जाणे पण ते पर्याय लोकालोकमां जती नथी अने लोकालोक पर्यायमां पेसता नथी, आवी ज्ञाननी पर्याय पोते पोताथी थाय छे. आम प्रत्येक द्रव्यनी पर्याय पोते पोताथी ज थाय छे.

अहीं द्रव्य-पर्यायनी भिन्नतानी वात नथी. अहीं तो एटलुं सिद्ध करवुं छे के पोतानी पर्यायमां व्याप्यव्यापकपणे आत्मा छे अने जडनी पर्यायमां व्याप्यव्यापकपणे जड छे. अहीं तो बे द्रव्योना भेदनी वात छे. आत्मा पोताना परिणामने करे अने परना परिणामने पण करे एम नथी. लोको कहे छे के एक गायनो गोवाळ ते पांच गायोनो गोवाळ. एम जीव पोताना विकारने पण करे अने परनुं कार्य पण करे एम छे नहि. विकारी पर्याय विकाररूप पोताथी छे, परथी नथी. परवस्तु आत्मानी पर्यायने करे, अशुद्धताने करे एवुं जाणपणुं अज्ञान छे अने आत्मा परनुं कार्य करे एम जाणवुं ए पण अज्ञान छे.

ज्ञानावरणीय कर्मथी ज्ञाननी हीणी पर्याय थाय एम छे नहि; केमके ज्ञानावरणीय कर्म परद्रव्य छे अने ज्ञाननी हीणी दशा जीवमां पोतामां पोताथी थाय छे. अहीं सिद्धांत कहे छे के-‘बे द्रव्यो एक थईने परिणमे तो सर्व द्रव्योनो लोप थई जाय.’ विकारी पर्यायनुं सत्त्व पोताथी छे. जो एम न होय तो एक समयनी पर्यायनो लोप थई जाय अने तो द्रव्यनो पण लोप थई जाय, द्रव्य सिद्ध न थाय.

एक समयनी पर्याय चाहे तो मिथ्यात्वनी हो, रागद्वेषनी हो के विषयवासनानी हो-ते पर्याय जो जडकर्मथी थाय तो ते पर्यायनी सत्ता परथी थई. तो पर्यायनी सत्तानो लोप थई गयो. पर्यायनो लोप थतां द्रव्य पण सिद्ध न थयुं. आम सर्वद्रव्योनो लोप थई जाय. अरे भाई! त्रण काळनी पर्यायोनो पिंड अने अनंत गुणोनो पिंड ते द्रव्य छे. माटे पोतानी पर्याय पोताथी थाय, परथी न थाय एम सिद्ध थाय छे अने ते यथार्थ छे.

विकार छे ते एक समयनुं सत् छे, मिथ्यात्व उत्पन्न थाय ते पण ते समयनुं सत् छे. ते जो दर्शनमोहनीय कर्मथी थाय एम माने तो पर्यायनी स्वतंत्रतानो नाश थई जाय, तो द्रव्यनो पण नाश थई जाय. आम सर्व द्रव्योनो लोप थई जाय.

फरी आ अर्थेने द्रढ करे छेः-

* कळश प४ःश्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘एकस्य हि द्वौ कर्तारो न स्तः’ एक द्रव्यना बे कर्ता न होय. एटले के एक