२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प निरंजन [भावः] (एक) भाव छे तोपण- [त्रिविधः] त्रण प्रकारनो थयो थको [सः उपयोगः] ते उपयोग [यं] जे [भावम्] (विकारी) भावने [करोति] पोते करे छे [तस्य] ते भावनो [सः] ते [कर्ता] कर्ता [भवति] थाय छे.
उत्पन्न थता जे आ त्रण मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने अविरतिभावरूप परिणामविकारो तेमना निमित्ते (-कारणथी) -जोके परमार्थथी तो उपयोग शुद्ध, निरंजन, अनादिनिधन वस्तुना सर्वस्वभूत चैतन्यमात्रभावपणे एक प्रकारनो छे तोपण-अशुद्ध, सांजन अनेकभावपणाने पामतो थको त्रण प्रकारनो थईने, पोते अज्ञानी थयो थको कर्तापणाने पामतो, विकाररूप परिणमीने जे जे भावने पोतानो करे छे ते ते भावनो ते उपयोग कर्ता थाय छे.
परिणम्यो तेथी जे भावरूप ते परिणम्यो ते भावनो तेने कर्ता कह्यो. आ रीते उपयोगने कर्ता जाणवो. जोके शुद्धद्रव्यार्थिकनयथी आत्मा कर्ता छे नहि, तोपण उपयोग अने आत्मा एक वस्तु होवाथी अशुद्धद्रव्यार्थिकनये आत्माने पण कर्ता कहेवामां आवे छे.
हवे आत्माने त्रण प्रकारना परिणामविकारनुं कर्तापणुं दर्शावे छेः-
‘ए प्रमाणे अनादिथी अन्यवस्तुभूत मोह साथे संयुक्तपणाने लीधे पोतानामां उत्पन्न थता जे आ त्रण मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने अविरतिभावरूप परिणामविकारो तेमना निमित्ते (कारणथी)-जोके परमार्थथी तो उपयोग शुद्ध, निरंजन, अनादिनिधन वस्तुना सर्वस्वभूत चैतन्यमात्रभावपणे एक प्रकारनो छे तोपण-अशुद्ध, सांजन अनेक भावपणाने पामतो थको त्रण प्रकारनो थईने, पोते अज्ञानी थयो थको कर्तापणाने पामतो, विकाररूप परिणमीने जे जे भावने पोतानो करे छे ते ते भावनो ते उपयोग कर्ता थाय छे.
जुओ! आचार्यदेवे शुं अद्भुत वात करी छे! कहे छे के परमार्थथी उपयोग शुद्ध छे, निरंजन छे, अनादिनिधन वस्तुना सर्वस्वभूत चैतन्यमात्रभावपणे एक प्रकारनो छे. अहाहा.....! आत्मानो त्रिकाळी ज्ञानदर्शननो जे उपयोग छे ते शुद्ध छे. वस्तु-द्रव्य शुद्ध, तेना गुण शुद्ध अने तेनो वर्तमान वर्ततो त्रिकाळी कारणपर्यायरूप अंश पण शुद्ध छे, निरंजन एटले अंजन रहित-मलिनता रहित छे अने अनादि-निधन एटले अनादि अनंत छे. ज्ञानदर्शननो आ उपयोग वस्तुना सर्वस्वभूत छे, संपूर्ण छे. ते उपयोग चैतन्यमात्रभावपणे एक प्रकारनो छे. आम परमार्थथी आत्मा परिपूर्ण शुद्ध छे.