समयसार गाथा-९० ] [ ३
तोपण अशुद्ध, सांजन, अनेकभावपणाने पामतो थको त्रण प्रकारनो थईने पोते अज्ञानी थयो थको कर्तापणाने पामतो, विकाररूप परिणमीने जे जे भावने पोतानो करे छे ते ते भावनो ते उपयोग कर्ता थाय छे. मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने अविरतिरूप परिणामनो कर्ता अज्ञानीनो आत्मा छे, जडकर्म ते भावनो कर्ता नथी.
प्रश्नः– शुं विकार कर्मना निमित्त विना थाय छे?
उत्तरः– हा, विकार थाय छे ते पर अने निमित्तनी अपेक्षा विना पोताथी स्वतंत्र थाय छे. विकार निश्चयथी पोताथी थाय छे; तेमां पर वस्तु निमित्त हो, पण ते निमित्त विकारनुं कर्ता छे एम नथी.
प्रश्नः– विकार परना निमित्त विना थाय तो विकार स्वभाव थई जशे.
उत्तरः– विकार पोताथी स्वतंत्र थाय छे. एम समयनी पर्यायनी ते योग्यता-स्वभाव छे. कर्मनुं निमित्त हो, पण विकार थवामां जडकर्म अकिंचित्कर छे. ज्ञानमां जे हीणी अवस्था थाय छे ते पोतानी योग्यताथी थाय छे; तेमां ज्ञानावरणीय कर्म कांई करतुं नथी. ज्ञानावरणीय कर्म ज्ञाननी हीणी दशामां निमित्त हो, पण ते कर्ता नथी.
लौकिक जनो जगतकर्ता ईश्वरने माने छे अने कोई जैनो (जैनाभासीओ) जडकर्मने कर्ता माने छे; पण वस्तुस्वरूप एम नथी. शास्त्रमां कथन आवे के ज्ञानावरणीय कर्म ज्ञान प्रगट थवामां आवरण करे, पण ए तो निमित्तनुं कथन छे. खरेखर जडकर्म आत्माना ज्ञानने आवरण करतुं नथी.
जीवमां विकारनी पर्याय उत्पन्न थाय छे ते एनी जन्मक्षण छे. प्रवचनसार गाथा १०२मां पाठ छे के सर्वद्रव्योमां जे समये जे पर्याय उत्पन्न थाय छे ते एनो स्वकाळ-जन्मक्षण छे. ते पर्याय परथी उत्पन्न थाय छे एम छे नहि. उचित बाह्य निमित्त हो, पण निमित्त द्रव्यना परिणामनुं कर्ता नथी.
तत्त्वार्थराजवार्तिकमां जे बे कारणनी वात आवे छे ए त्यां प्रमाणनुं ज्ञान कराव्युं छे. दरेक कार्य पोताथी स्वतंत्रणे थाय छे ए वात राखीने एमां निमित्त कोण छे एनुं साथे ज्ञान कराव्युं छे. कार्य पोताथी थाय छे ए निश्चयनी वातने निषेधीने शुं कार्यनो कर्ता निमित्त छे एम त्यां कह्युं छे? तो तो प्रमाणज्ञान ज रहेशे नहि. निश्चयथी परिणति पोते पोताथी स्वतंत्रपणे उत्पन्न थाय छे ए वातने सिद्ध राखीने जोडे निमित्तनुं ज्ञान कराव्युं छे ते प्रमाणनो विषय छे.
कोई माने के कर्मनुं जोर छे तो विकार करवो पडे तो ते मान्यता बराबर नथी. जीवने विकार थाय छे एमां निमित्तनुं बीलकुल कर्तापणुं नथी. कहे छे ने के-अनादिथी अन्यवस्तुभूत मोह साथे संयुक्तपणाने लीधे पोतानामां उत्पन्न थता जे आ त्रण मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने अविरतिभावरूप परिणामविकारो तेना निमित्ते उपयोग त्रण