Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-९० ] [

-अने स्वभावसन्मुख पर्याय थई एमां पुरुषार्थ आव्यो. -अने त्यारे कर्मनो अभाव थयो-एमां निमित्त आव्युं.

आम क्रमबद्धनो निर्णय करनारनी द्रष्टि ज्ञायक उपर होय छे. त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य उपर जेनी द्रष्टि होय छे ते ज क्रमबद्धनो यथार्थ निर्णय करी शके छे. क्रमबद्ध जे छे ए तो पर्याय छे. पर्यायना आश्रये पर्यायनो निर्णय थतो नथी. द्रव्यना आश्रये सम्यग्ज्ञान थाय छे. द्रव्यना आश्रये जे सम्यग्ज्ञान थयुं ते क्रमबद्धपर्यायनुं ज्ञान करे छे. पर्यायना आश्रये क्रमबद्धनुं ज्ञान थतुं नथी.

अहीं कहे छे के मिथ्यादर्शन आदि विकारी परिणामनो, उपयोग, स्वयं अज्ञानी थईने, कर्ता थाय छे. जे जे भावने पोताना करे ते ते भावनो उपयोग कर्ता थाय छे. आ पर्यायरूप उपयोगनी वात छे. त्रिकाळी द्रव्यस्थित उपयोग तो एनाथी भिन्न छे अने ए तो शुद्ध निरंजन छे. परंतु पर्यायनो जे उपयोग छे ते ते काळे विकारनो कर्ता थाय छे. जड कर्म एमां निमित्त छे, पण ते विकारनुं कर्ता नथी. मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने रागादि पुण्यपापना भावरूप जे जे विकार थाय छे ते विकारनो, पोते विकाररूप परिणमीने, उपयोग कर्ता थाय छे. केटली स्पष्ट वात छे! भाई! वखत लईने, निवृत्ति लईने आ वातनी समजण करवी जोईए. अहीं तो कहे छे के आत्मा कर्मना निमित्तथी निवृत्त छे, केमके कर्मना निमित्तथी विकारी परिणाम उत्पन्न थाय छे एम छे नहि.

अहाहा.....! त्रिकाळी उपयोग शुद्ध, निरंजन, चैतन्यमात्रभावपणे एक प्रकारनो छे; तोपण वर्तमान पर्यायरूप उपयोग अशुद्ध, सांजन अने अनेकपणाने पामतो थको मिथ्यात्वादि त्रण प्रकारनो थाय छे. अज्ञानी जीव अनेक प्रकारना मिथ्यात्वादि भावने प्राप्त थाय छे. वर्तमान उपयोग छे ते अज्ञानी थयो थको त्रण प्रकारे थईने कर्तापणाने पामे छे. जड कर्म विकारना कर्तापणाने पामे छे एम नथी. पुण्य-पाप, दया, दान, विषयवासना इत्यादि जे भाव थाय छे तेमां जड कर्म निमित्त छे, पण ते निमित्तना कारणे ए भाव थाय छे एम नथी. अज्ञानीनो उपयोग त्रण प्रकारे थईने कर्तापणाने पामे छे. अज्ञानी पोते रागनो कर्ता थाय छे. आमां गर्भितपणे एम पण आव्युं के ज्ञानी रागनो कर्ता नथी. ज्ञानी तो रागनो ज्ञाता छे. ज्ञानीने जे राग छे ते रागनो आत्मा कर्ता नथी.

भाई! आ तो वीतरागनो मार्ग छे. समयसार, प्रवचनसार आदि शास्त्रो भगवाननी दिव्यध्वनिनो सार छे. सर्वज्ञ परमात्माए जे कह्युं ते अनुसार चार ज्ञानना धणी, चौद पूर्वनी अंतःमुहूर्तमां रचना करनारा गणधरोए कह्युं छे. तेनो सार आ शास्त्रोमां भर्यो छे. अरे! अज्ञानी अल्पज्ञ जीवो एमां पोतानी मति-कल्पनाथी अर्थ करे ते केम चाले? तेमां जराय फेरफार करे तो एथी मिथ्यात्वनो महा दोष ऊपजे.