Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प

पाणी उष्ण थाय ते पोतानी योग्यताथी थाय छे, अग्निथी नहि. अग्नि तेमां निमित्त छे पण निमित्त कर्ता नथी. सुंदर स्त्रीनुं रूप देखीने जे वासनाना परिणाम थाय ते वासनाना परिणामनो कर्ता अज्ञानी जीव पोते छे. स्त्रीनुं सुंदर रूप तेमां निमित्त छे, पण निमित्तने लईने वासनाना परिणाम थया नथी. ज्ञानावरणीय कर्मने लईने ज्ञाननी हीणी दशा छे एम नथी. ज्ञाननी हीणी दशा स्वयं पोताथी छे अने तेमां ज्ञानावरणीय कर्म निमित्त छे. जीवनी ज्ञान-दर्शननी हीणी पर्याय थाय छे ते भावघातिना कारणे थाय छे, द्रव्यघाति कर्म एमां निमित्त छे. ‘घातिकर्मना निमित्तथी’ एम कथन आवे छे पण ए तो निमित्तनुं कथन छे. जड घातीकर्म आत्मानी पर्यायनो घात करे छे एम नथी. भावघातीकर्मथी पोतानी हीणी पर्याय थाय छे तो द्रव्यघातीकर्मने निमित्त कहेवामां आवे छे. द्रव्यकर्म निमित्त छे, पण ते भावघातीकर्मनुं कर्ता नथी.

* गाथा ९०ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘पहेलां कह्युं हतुं के जे परिणमे ते कर्ता छे. अहीं अज्ञानरूप थईने उपयोग परिणम्यो तेथी जे भावरूप ते परिणम्यो ते भावनो तेने कर्ता कह्यो. आ रीते उपयोगने कर्ता जाणवो.

जे परिणमे ते कर्ता छे. विकाररूपे उपयोग परिणमे छे. तेथी ते उपयोगने विकारनो कर्ता कह्यो; निमित्त कर्ता नथी. ज्ञानावरणीय आदि कर्म परद्रव्य छे. ते आत्मानी पर्यायने अडतुंय नथी, केमके आत्मानी विकारी पर्याय अने कर्मनी पर्याय ए बन्ने वच्चे अत्यंताभाव छे.

आ शरीरमां पीडा थाय ते अशातावेदनीयना निमित्तथी थाय छे. एनो अर्थ शुं? शरीरनी अवस्था तो जे काळे जे थवानी होय ते एनाथी थाय छे, तेमां अशातानो उदय निमित्त छे, पण अशातानो उदय शरीरनी अवस्थानो कर्ता नथी. तथा ते वखते जीवमां पीडानो जे अनुभव थाय छे ते तेनी योग्यताथी स्वतंत्र थाय छे, एमां शरीरनुं के कर्मनुं कांई कर्तव्य नथी. आ पैसा आदि सामग्री मळे छे ते शातावेदनीयना उदयना निमित्ते मळे छे. त्यां उदय तो निमित्तमात्र छे. पैसा पैसाना कारणे आवे छे. पैसानी आववानी क्रिया थई तेनो शातावेदनीय कर्मनो उदय कर्ता नथी, केमके जे परिणमे ते कर्ता छे.

मिथ्यात्व अने रागद्वेष आदि विकाररूपे उपयोग परिणमे छे माटे ते विकारपरिणामनो उपयोग कर्ता छे. अज्ञानरूपे थईने जे भावरूप उपयोग परिणमे ते भावनो उपयोग कर्ता छे.

‘शुद्ध द्रव्यार्थिक नयथी आत्मा कर्ता छे नहि, तोपण उपयोग अने आत्मा एक