गाथा ११ मां एम कह्युं के व्यवहारनय असत्यार्थ छे अने निश्चयनय सत्यार्थ छे. आ आत्मा जे वस्तु छे ते द्रव्य, गुण, पर्याय एम त्रणे मळीने आखुं सत् छे. तेमां अनंतगुणनो पिंड ते द्रव्य, गुण एटले शक्ति अने पर्याय कहेतां अवस्था. आ त्रणे थईने सत्नुं पूर्णरूप छे ए त्रण थईने एक सत्तानी अपेक्षाए बीजा पर पदार्थोने असत् कहेवामां आवे छे. बीजी रीते कहीए तो ‘उत्पाद-व्यय-ध्रौव्ययुक्तम् सत्’ तेमां उत्पाद-व्यय ते पर्याय छे, द्रव्य (अने गुण) त्रिकाळ छे. आ त्रण थईने एक सत् छे. तेनी अपेक्षाए बीजा पर पदार्थो असत् छे. आत्मा बीजामां नहीं अने बीजा पदार्थो आत्मामां नहीं ए अपेक्षाए बीजा पदार्थोने असत् कही व्यवहार कह्यो छे.
हवे अहीं एम कहे छे के- द्रव्यअनंतगुणोथी अभेद एक वस्तु छे, एवुं पर्याय विनानुं त्रिकाळी ध्रुव अखंड एक अभेद पूर्ण द्रव्य जे वस्तु ते सत् छे अने तेनी अपेक्षाए एक समयनी पर्याय ते असत् छे.
त्यारे प्रश्न एम थाय छे के पर्याय जे छे तेने असत् केम कही? तेनो खुलासो एम छे के प्रयोजनवश मुख्य-गौण करीने आम कहेवामां आव्युं छे. पर्याय पर्यायपणे तो छे; एक द्रव्यमां जेम बीजी चीज सर्वथा नथी तेम आ पर्याय सर्वथा नथी एम नथी. जेम बीजी चीज आत्मामां छे ज नहीं तेम पर्यायना स्वरूपनुं न समजवुं. पर्याय पर्यायपणे तो सत् छे. परंतु भगवान पूर्णानंद-स्वरूप जेने द्रव्य कहीए, जे अखंड एक ज्ञायकभावमात्र परमपारिणामिकस्वभावभावरूप छे तेनो आश्रय करतां सम्यग्दर्शनादि धर्म प्रगट थाय छे. धर्म प्रगट करवानुं आ प्रयोजन सिद्ध करवा त्रिकाळी ध्रुव द्रव्यने मुख्य करीने तेने निश्चय कही सत्यार्थ कहेल छे. ज्यारे वर्तमान पर्यायना आश्रये सम्यग्दर्शनादि धर्म प्रगट थतो नथी, पण रागादि विकल्प थाय छे तेथी पर्यायनो आश्रय छोडाववा तेने गौण करीने व्यवहार कही असत्यार्थ कहेल छे. पर्यायने गौण करीने एटले