Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 165 of 4199

 

१प८ [ समयसार प्रवचन

के तेने पेटामां राखीने, द्रव्यमां भेळवीने नहीं; पर्याय पर्यायमां छे एम राखीने एनी मुख्यता न करतां, तळेटीमां राखीने तेने असत्यार्थ कहेवामां आवेल छे.

भगवान पूर्णानंद स्वरूप जेने द्रव्य कहीए, जेने ज्ञायक कहीए, जेने परम पारिणामिक स्वभावभाव कहीए तेने मुख्य करी निश्चय कही सत्य कहेवामां आवेल छे. आम शा माटे कह्युं? के त्रिकाळी सत्यार्थ वस्तुना आश्रये सम्यक्दर्शन प्रगट थाय छे अने बीजी कोई रीते सम्यक्दर्शन प्रगट थतुं नथी. आवा भूतार्थ, अभेद एकरूप द्रव्यमां द्रष्टि जाय-द्रष्टि प्रसरे त्यारे तेने सम्यक्दर्शन थाय छे. त्यांथी धर्मनी शरूआत थाय छे. आ तो हजु सम्यक्दर्शननी प्राप्तिनुं प्रयोजन सिद्ध करवानी वात चाले छे, चारित्र तो क्यांय रह्युं. आ कोई अलौकिक अने अपूर्व चीज छे भाई!

आ रीते पर्यायने गौण करीने गाथा ११मां कथंचित् असत्य कही तो पर्याय छे के नहीं, एनुं अस्तित्व छे के नहीं एनुं गाथा १२ मां ज्ञान करावे छे.

अनादिकाळथी जीवने मिथ्यात्वभावना कारणे रागनुं वेदन अने रागनो स्वाद हतो. तेने कोई प्रकारे द्रष्टिनो विषय जे पूर्णानंदस्वरूप भगवान आत्मा एनुं भान थतां, एनो प्रत्यक्ष अनुभव थतां सम्यग्दर्शन सहित अतीन्द्रिय आनंदनो स्वाद आव्यो ए तो निश्चय थयो. त्यारे ते धर्मनी शरूआत थतां साधक बन्यो. आवा साधक आत्माने पूर्णशुद्धतारूप परमात्मदशा प्राप्त न थाय-स्वनो पूर्ण आश्रय न थाय त्यां सुधी पर्यायमां क्रमशः शुद्धि वधे छे, अशुद्धि घटे छे-एवुं कांई रहे छे के नहीं? आम व्यवहारनुं ११ मी गाथा पछी आ १२ मी गाथामां स्पष्ट ज्ञान करावे छे. पूर्णदशाने प्राप्त परमात्माने कांईक शुद्धता अने कांईक अशुद्धता एवुं होतुं नथी. एने तो संपूर्ण शुद्धता प्रगट थई गई छे एटले व्यवहार होतो नथी. परंतु नीचली दशामां एटले के जघन्यदशाथी-सम्यग्दर्शनथी जे आगळ चाल्यो छे, एटले के श्रद्धाथी आगळ जेने आत्म-एकाग्रता क्रमशः वधती चाली छे, पण पूर्णदशा-उत्कृष्टदशा थई नथी एवा मध्यमभावने अनुभवता साधकने शुद्धतानी साथे महाव्रत आदिना विकल्पो पण छे ते जाणेला प्रयोजनवान छे एम हवे कहे छे.

गाथा १२नी उत्थानिकाः (प्रवचन)

हवे “ए व्यवहारनय पण कोई कोईने, कोई वखते प्रयोजनवान छे, सर्वथा निषेध करवा योग्य नथी; तेथी तेनो उपदेश छे.” ११ मी गाथामां निश्चयनय आश्रय करवानी अपेक्षाए आदरेलो प्रयोजनवान कह्यो. हवे व्यवहारनय पण कोई कोईने एटले