Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] १प९

के जे जघन्यपूर्वक मध्यमदशामां वर्ते छे तेने साधकदशाना काळमां प्रयोजनवान छे; अर्थात् साधक-अवस्थामां शुद्धताना अंशो पूर्ण नथी अने कांईक अशुद्धता छे एने जाणेली प्रयोजनवान छे. पर्यायगत शुद्धता-अशुद्धता छे ए व्यवहार छे, एने जाणवुं के आटलुं छे एनुं नाम व्यवहार जाणेलो प्रयोजनवान छे; आदरेलो प्रयोजनवान छे एम नथी. आदरेलो प्रयोजनवान तो एकमात्र त्रिकाळी शुद्ध निश्चय ज छे. त्रिकाळी शुद्ध निश्चयनो आश्रय लईने सम्यग्दर्शन, ज्ञान अने स्वरूपनी स्थिरताना अंशरूप स्वरूपाचरण थयुं. परंतु संपूर्ण निर्विकल्प वीतरागदशा प्रगट न थई होय त्यांलगी साधकदशामां साधकने महाव्रतादिना विकल्पो छे, ते व्यवहार छे. ते साधकअवस्थामां जाणेलो प्रयोजनवान छे; आ एनो सार छे. ‘व्यवहारनय पण प्रयोजनवान छे’ तेनी व्याख्या आ एक ज छे के जाणेलो प्रयोजनवान छे, आदरेलो नहीं. कथनशैली गमे ते आवे पण अर्थ तो आ ज छे के त्रिकाळी निश्चय आदरेलो प्रयोजनवान छे अने आ राग जे व्यवहार छे ते जाणेलो प्रयोजनवान छे.

११मी गाथा जैनदर्शननो प्राण छे. तेनी साथे आ १२मी गाथामां व्यवहार जोडयो छे. साधकनी पर्यायमां शुद्धता साथे महाव्रतना, अणुव्रतना, भक्ति आदिना विकल्पो होय छे, ए नथी एम नहीं. ‘नथी’ एम कह्युं हतुं ए तो गौण करीने कह्युं हतुं. साधकदशामां जीवने कांईक शुद्धता अने कांईक अशुद्धता पर्यायमां छे. व्रत, भक्ति आदिनो शुभराग छे. पण ए शुभराग निश्चयनुं कारण नथी, तेम पर्यायमां राग नथी एम पण नहीं ते शुभराग आदि जाणवा योग्य छे एटलुं ज; माटे तो कहे छे के सर्वथा निषेध करवा योग्य नथी. जुओ, जेम परद्रव्य जीवमां नथी, एम राग पर्यायमां सर्वथा नथी एम तो नथी. कथंचित् नथी अने कथंचित् छे; त्रिकाळी ध्रुव द्रव्यमां नथी ते अपेक्षाए ‘नथी’ अने एने ज वर्तमाननी अपेक्षाए ‘छे’ एम कहे छे. ए ‘छे’ ते जाणेलो प्रयोजनवान छे एम कहे छे.

गाथार्थ उपरनुं प्रवचनः गाथा १२

‘परमभावदर्शिभिः’ जे शुद्धनय सुधी पहोंची श्रद्धावान थया छे तथा पूर्ण ज्ञान-चारित्रवान थई गया तेमने तो शुद्ध (आत्मा) नो उपदेश (आज्ञा) करनार शुद्धनय जाणवा योग्य छे.’ जुओ, शुद्धनयनो आश्रय (शुद्धनयना विषयनो आश्रय)तो समकितीने होय छे अहीं तो शुद्धनय (केवळज्ञान थतां) पूर्ण थइ गयो छे, तेनो आश्रय करवानो हवे रह्यो नथी ए अपेक्षाए अहीं वात करी छे. जे शुद्धनय सुधी पहोंची श्रद्धावान थया एटले के जे समकिती थया तथा पूर्णज्ञान जे केवळज्ञान तेने प्राप्त थया तथा