चारित्रनी संपूर्ण स्थिरताने पाम्या तेमने तो शुद्धनयनो विषय जे शुद्ध आत्मा तेनो आश्रय करवानो रह्यो नहीं. तेमने तो शुद्धनय जाणवा योग्य छे एटले के एनुं फळ जे कृतकृत्यपणुं आव्युं तेनुं केवळज्ञानमां जाणपणुं थयुं. पूर्ण निर्विकल्पदशा जेने थई गई, ते तेने मात्र जाणे छे, अधूरी दशानो राग तेने नथी तेथी व्यवहार पण रहेतो नथी. एम तो निर्विकल्प ध्यानमां बे मोक्षमार्ग कह्या छे. द्रव्यसंग्रह गाथा ४७मां आवे छे- “दुविहं पि मोक्खहेउं झाणे पाउणदि जं मुणी णिमया” त्रिकाळी ध्रुवना आश्रये जे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र थाय ए निश्चय मोक्षमार्ग अने अंदरमां निर्विकल्प ध्यानमां बुद्धिपूर्वक राग तो नथी पण जे अबुद्धिपूर्वक राग कह्यो छे. एने आरोपित करी व्यवहार मोक्षमार्ग कह्यो. आम निर्विकल्प ध्यानमां मुनिराजने एकलो निश्चय छे अने व्यवहार नथी एम तो नथी. त्यां व्यवहार पण कह्यो छे अहीं तो ध्याननुं फळ जे संपूर्ण निर्विकल्पता थई छे एवा केवळज्ञानीने व्यवहार रहेतो नथी; केमके पूर्ण दशामां कोई राग रहेतो नथी पण संपूर्ण वीतरागता छे. जे पूर्ण दशा थई एने मात्र जाणे छे. ‘वळी जे जीवो अपरमभावे स्थित छे-अर्थात् श्रद्धा तथा ज्ञान-चारित्रना पूर्ण भावने नथी पहोंची शक्या, साधक अवस्थामां ज स्थित छे, तेओ व्यवहार द्वारा उपदेश करवा योग्य छे.’ सम्यग्दर्शन थयुं छे, पण सम्यग्ज्ञान-चारित्र पूर्ण थयां नथी, सर्वज्ञतानी प्रतीति थई छे पण सर्वज्ञपद प्रगट थयुं नथी एवी साधकदशामां जे स्थित छे तेओ व्यवहारदेशिताः एटले व्यवहार द्वारा उपदेश करवा योग्य छे. शब्द तो छे व्यवहारदेशिताः, पण एनो वाच्यार्थ तो एम छे के ते काळे जेटलो कांई व्यवहार छे ते जाणवा योग्य छे. प्रतिसमय साधकने शुद्धता वधे छे, अशुद्धता घटे छे. जे जे समयनी, जेटली शुद्धता-अशुद्धता छे तेने जेम छे तेम ते ते समये जाणवी ते प्रयोजनवान छे. आ तो सर्वज्ञ परमेश्वरनो मार्ग छे, भाई! आ कांई कथा-वार्ता नथी. दिगंबर संतो तो केवळीना केडायतो छे. केवळीना पेट खोलीने वात करी छे. जुओ, आ मुनिओ आनंदमां मस्त छे. ते दशामां विकल्प ऊठे छे अने शास्त्र शास्त्रना कारणे लखाई जाय छे. त्यारे कहे छे के शास्त्र लखवानो विकल्प तो छे के नहीं? पूर्णता तो आ काळे नथी, तेथी विकल्प छे. अनेक प्रकारना विकल्पना अंशो आवे छे. ते (विकल्पो) पाठमां तो एम छे के व्यवहारदेसिदा एटले के उपदेश करवा योग्य छे. पण एनो आशय एम नथी. आ तो कथनशैली छे. एनो अर्थ तो पर्यायमां शुद्धता साथे जे कांईक अशुद्धता पण छे तेने जाणवी ते प्रयोजनवान छे. शुं कह्युं? जाणवुं ते प्रयोजनवान छे. जाणीने शुं करवुं? अशुद्धता छोडवा योग्य हेय छे एम जाणी त्रिकाळी ध्रुवने उपादेय करी हेय