(राग) ने छोडवुं. व्यवहारनय अने व्यवहारनयनो विषय छे, ते जे ते काळे साधकदशामां जाणे तो प्रयोजनवान छे; उपादेय तो मात्र शुद्ध निश्चय ज छे.
वस्तु जे अखंड एक ज्ञायकभाव छे ते परिपूर्ण छे, कृतकृत्य छे. एने करवानुं कांई छे नहीं. पण एनी द्रष्टि करनार साधकने ज्यांसुधी पर्यायमां कृतकृत्य पूर्णदशा प्रगट न थाय त्यांसुधी स्थिरता करवानी छे अने अस्थिरता छोडवानी छे. आ एने करवानुं छे माटे तेने व्यवहार जाणेलो प्रयोजनवान छे-एम कहेवा मागे छे. ज्ञायकनी द्रष्टिपूर्वक पर्यायमां परिपूर्ण कृतकृत्य थई गयेल परमात्माने स्थिरता वधारवानुं अने अस्थिरता मटाडवानुं एवुं कांई रहेतुं नथी माटे तेमने व्यवहार होतो नथी.
लोकमां सोळ-वलुं सोनुं प्रसिद्ध छे. सोनुं ज्यांसुधी चौद-वलुं के पंदर-वलुं होय छे त्यांसुधी तेमां चुरी आदि मलिनता अर्थात् अशुद्धता होय छे. तेवा अशुद्ध सोनाने अग्निनी आंच आपतां आपतां क्रमे क्रमे शुद्ध थई संपूर्ण सोळ-वलुं शुद्ध थई जाय छे. जेमने छेल्ला पाकथी ऊतरेलुं सोळ-वलुं सोनुं प्राप्त थई गयुं छे एमने तो चौद-वलुं, पंदर-वलुं आदि अशुद्ध दशाओ जाणवा जेवी रही नथी; पण जेमने सोळ-वला सोनानुं प्रयोजन छे, पण हजु प्राप्त थयुं नथी तेमने सोनानी चौद-वला अने पंदर- वलानी दशाओ जाणवी प्रयोजनभूत छे. सोळ-वलुं सोनुं प्राप्त थई गया पछी तेनाथी नीचेनी दशाओ जाणवानी रहेती नथी.
ए प्रमाणे जे जीवने केवळज्ञाननी पूर्ण दशा प्राप्त थई गई छे एने तो त्रिकाळी स्वभावनो आश्रय करवानो रह्यो नथी, कारण के तेने शुद्धनय पूर्ण थई गयो छे. आस्रव अधिकारमां आवे छे के केवळज्ञान प्रगट थतां शुद्धनय पूर्ण थई जाय छे. तेथी जेणे पर्यायमां उत्कृष्ट अचलित अखंड एकस्वभावरूप एक भाव प्रगट कर्यो छे अर्थात् पर्यायमां जेणे पूर्णदशा प्रगट करी छे तेने तो शुद्धनय ज सौथी उपरनी एक भूमिका समान होवाथी पूर्ण छे; अने ते जाणेलो प्रयोजनवान छे. अहीं जाणेलो प्रयोजनवान छे एटले जे पूर्णदशा प्रगट थई गई तेने बस जाणे छे. एक बाजु एम कहे छे के केवळज्ञाननी पर्याय पण सद्भूत व्यवहार छे, अने अहीं एम कह्युं के केवळज्ञान थतां शुद्धनय पूर्ण थई गयो? ए तो केवळज्ञान थतां शुद्धनयनो आश्रय लेवानो बाकी रह्यो नहीं ए अपेक्षाए कथन छे. ज्यां जे अपेक्षाथी कथन कर्युं होय ते अपेक्षा बराबर समजवी जोईए.