हवे एनुं कारण आपे छे-के तीर्थ अने तीर्थना फळनी एवी ज व्यवस्थिति छे. जेनाथी तराय ए तीर्थ छे. अंतरमां मोक्षमार्गनी पर्याय छे ते तीर्थ छे केमके एनाथी तराय छे. त्रिकाळी ध्रुव ज्ञायकभावनी द्रष्टि, ज्ञान अने रमणतास्वरूप जे रत्नत्रयनी पर्याय ए तीर्थ छे. एनाथी संसार तराय छे. रत्नत्रयरूप मोक्षमार्गनी जे निर्मळ पर्याय ते व्यवहार छे. ए पर्याय छे ने? तेथी तेने व्यवहारधर्म कह्यो छे. शुभराग ए व्यवहारधर्म ए वात अहीं नथी. त्रिकाळी द्रव्य जे निष्क्रिय छे ते निश्चय. तेनी अपेक्षाए मोक्षमार्गनी निर्मळ पर्याय ते व्यवहार छे. द्रव्य ते निश्चयनयनो विषय अने पर्याय ते व्यवहारनयनो विषय छे. कहे छे के जो व्यवहारनय न होय तो तेना विषयभूत तीर्थ अने तीर्थनुं फळ क्यां गयुं? पर्याय क्यां गई? तेथी मोक्षनो मार्ग ते तीर्थ छे, पार थवुं ते तीर्थनुं फळ छे. पूर्ण केवळज्ञान पामवुं ए मोक्षमार्गनुं फळ छे. केवळज्ञान पण पर्याय छे ने? पर्यायने न मानो तो मोक्षमार्ग रहेतो नथी, अने मोक्षमार्गनुं फळ जे केवळज्ञान अने सिद्धपद ते पण रहेतां नथी, केमके ए पर्याय छे. पर्याय छे ते व्यवहार छे. माटे तीर्थ अने तीर्थफळनी एवी ज व्यवस्थिति छे ते यथार्थ जाणवी. व्यवहारधर्म ते तरवानो उपाय छे तेथी कोई अहीं एम कहे के पुण्यभाव जे शुभराग ते वडे तराय छे तो तेनी वात जूठी छे. शुभराग ए तो बंधनुं कारण छे, ए तो असद्भूत व्यवहार छे. अहीं तो सद्भूत व्यवहारनी वात छे. त्रिकाळी ज्ञायकभावनो आश्रय लईने जे निर्मळ पर्याय प्रगटे ते सद्भूतव्यवहार छे, ते मोक्षमार्ग छे, अने तेनुं फळ जे केवळज्ञान ए सद्भूत पूर्णदशा थई ते छे. बीजी जग्याए कह्युं केः- “जइ जिणमयं एवज्जह ता मा ववहारणिच्छए मुयह।
आचार्य कहे छे के हे भव्य जीवो! जो तमे जिनमतने प्रवर्ताववा चाहता हो तो व्यवहार अने निश्चय- ए बन्ने नयोने न छोडो; कारण के व्यवहारनय विना तो तीर्थं-व्यवहारमार्गनो नाश थई जशे अने निश्चयनय विना तत्त्व (वस्तु) नो नाश थई जशे. जिनमतने एटले के वीतराग अभिप्रायने प्रवर्ताववा ईच्छता हो तो व्यवहार अने निश्चय बन्ने नयोने न छोडो. व्यवहार नथी एम न कहो. व्यवहार छे. पण त्यां (गाथा ११मां) असत्य कह्यो हतो ने? ए तो त्रिकाळ ध्रुव निश्चयनी विवक्षामां गौण करीने असत्य कह्यो हतो. बाकी व्यवहार छे, मोक्षनो मार्ग छे. व्यवहारनय न मानो तो तीर्थनो