Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१६४ [ समयसार प्रवचन

नाश थई जशे. चोथुं, पांचमुं, छठ्ठुं आदि चौद गुणस्थानो जे व्यवहारनयना विषय छे, ते छे मोक्षनो उपाय जे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र छे ते (व्यवहार) छे. चौद गुणस्थान द्रव्यमां नथी, पण पर्यायमां नथी एम जो कहो तो तीर्थनो नाश थई जशे. अने तेथी तीर्थनुं फळ जे मोक्ष अने सिद्धपद तेनो पण अभाव थई जशे. एम थतां जीवना संसारी अने सिद्ध एवा जे बे भाग पडे छे ए व्यवहार पण रहेशे नही.

बहु गंभीर अर्थ छे, भाई! भाषा तो जुओ. अहीं मोक्षमार्गनी पर्यायने तीर्थ कह्युं अने वस्तु जे छे तेने तत्त्व कह्युं छे. त्रिकाळी ध्रुव चैतन्यघन जे वस्तु ते निश्चय छे. ते वस्तुने जो न मानो तो तत्त्वनो नाश थई जशे. अने तत्त्वना अभावमां, तत्त्वना आश्रये उत्पन्न थतुं जे मोक्षमार्गरूप तीर्थ ते पण रहेशे नही. आम निश्चय वस्तुने न मानतां तत्त्वनो अने तीर्थनो बन्नेनो नाश थई जशे माटे वस्तुस्वरूप जेवुं छे तेवुं यथार्थ मानवुं.

ज्यांसुधी पूर्णता थई नथी त्यांसुधी निश्चय अने व्यवहार बन्ने होय छे. पूर्णता थई गई एटले पोते पोतमां पूर्ण स्थिर थई गयो त्यां सघळुं प्रयोजन सिद्ध थई गयुं प्रमाण थई गयुं, तीर्थफळ आवी गयुं.

भाई! अशुभथी बचाव शुभराग आवे खरो, पण ए कांई मूळमार्ग एटले के मोक्षमार्ग नथी. त्यारे कोई शुभराग अने तेनां निमित्त अरहंतादिने मूळथी उडाडे तो एम पण नथी. प्रतिमा, मंदिर, वगेरे छे पण ए शुभरागनां निमित्त छे, एनो आश्रय करतां धर्म नथी. धर्म तो एकमात्र त्रिकाळी चैतन्यभगवान पूर्णानंदना आश्रय विना बीजी कोई रीते न थाय. वस्तु तो अखंड पूर्ण कृतकृत्य छे. करवुं ए पर्यायमां आव्युं. मोक्षमार्ग करवो छे, थाय छे, ए व्यवहार थयो.

* भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

लोकमां सोळवलुं सोनुं प्रसिद्ध छे; पंदरवला सुधी सोनामां चुरी, तांबानो भाग वगेरे रहे छे. ए सोनाने ताप आपतां पूर्ण शुद्ध थई जाय एने सोळवलुं सोनुं कहे छे. पंदरवला सुधी सोनुं अशुद्ध छे. जे जीवोने सोनानां पूर्ण ज्ञान, श्रद्धान अने प्राप्ति थई गयां तेमने पंदरवलानुं कांई प्रयोजन नथी. पूर्ण शुद्ध थई गयुं ने? अने जेमने सोळवला शुद्ध सोनानी प्राप्ति थई नथी त्यांसुधी तेमने पंदरवला सुधीनुं सोनुं जाणवा जेवुं छे. ए जाणवुं प्रयोजनभूत छे.

एवी रीते जीव नामनो पदार्थ छे ते पुद्गलना संयोगथी पर्यायमां अशुद्ध अनेकरूप थई रह्यो छे. त्यां जेमने सर्व परद्रव्योथी भिन्न ज्ञायकभावमात्र जे चैतन्यसूर्य