समयसार गाथा-२०३ ] [ १प१
आ तो त्रणलोकना नाथनो पोकार छे भाई! जुओ, महाविदेहक्षेत्रमां सीमंधर परमात्मा साक्षात् अरिहंतपदे बिराजे छे. त्यां भगवान कुंदकुंदाचार्य २००० वर्ष पहेलां सं. ४९ मां गया हता. कहे छे-तेमनो आ पोकार छे के-तारुं चैतन्य पद तो ध्रुव स्थायी पद छे प्रभु! ते सिवाय पर्यायमां जे कांई रागादि छे ते बधांय अस्थायी अपद छे. अज्ञानी जीव जेने पोताना माने छे ते पैसा आदि तो कयांय दूर रही गया; केमके पैसा आदि के दि’ जीवना छे? ए तो जीवना द्रव्य-गुणमां नहि अने पर्यायमां पण नहि; साव भिन्न छे. ए तो धूळ छे. परंतु अहीं विशेष एम कहे छे के अंदर तारी पर्यायमां जे शुभाशुभ विकल्प ऊठे छे, दया, दान, भक्ति आदि विकल्प ऊठे छे ते बधाय अस्थायी होवाथी अपद छे; तारुं रहेवानुं ते स्थान नथी. हवे पछीना कळशमां ‘अन्यानि पदानि’ एम पाठ आवे छे. परम अध्यात्म तरंगिणीमां तेनो अर्थ एवो कर्यो छे के-व्रतादि अपद छे. अहो! दिगंबर संतो- मुनिवरोए केवळीनां पेट खोलीने मूकयां छे. जेनां भाग्य होय तेने आ वाणी मळे. कहे छे-एक आत्मा ज तारुं रहेवानुं स्थान छे; ते एक ज आस्वादवायोग्य छे. माटे जेमां कोई भेद नथी एवो अखंड एकरूप जे त्रिकाळस्थायी ज्ञायकभाव छे तेनो आश्रय कर, तेनो आस्वाद कर.
अहा... हा... हा...! भगवान! तुं परमार्थरसरूप आनंदरसनो-शान्तरसनो- अकषायरसनो समुद्र छो. तेमां अतंर्मग्न थतां शांतरसनो-आनंदरसनो (परम आह्लादकारी) स्वाद आवे छे. कह्युं छे ने के-
ल्यो, आ आत्मानुभवनी दशा छे अने ते सम्यक्त्व अने धर्म छे. भाई! जन्म- मरण मटाडवानी आ ज रीत छे. आ सिवाय व्यवहार करतां करतां निश्चय प्रगटे एम कोई माने तो ते व्यवहारमूढ छे. अहीं कहे छे-ए सघळो व्यवहारक्रियाकांड अपद छे, एनाथी (व्यवहारथी) त्रणकाळमां जन्म-मरण मटशे नहि.
आ पैसावाळा करोडपति ने अबजपति बधा पैसा वडे एम माने के अमे बधा सुखी छीए पण तेओ धूळमांय सुखी नथी सांभळने. पैसानी तृष्णा वडे तेओ बिचारा दुःखी ज दुःखी छे. पैसानी-धूळनी तो अहीं वातेय नथी.
हा, मुनिवरोने कयां पैसा होय छे? (ते वात करे?) अहा! मुनिने तो पैसा (परिग्रह) न होय, पण वस्तुमां-आत्मामां पण ते नथी. सूक्ष्म वात छे भाई! पैसा तो जड छे, अने आ शरीर पण जड माटी-पुद्गल छे. तेओ आत्मामां कयां छे? (नथी). अहीं तो एम वात छे के आ पैसा ने