Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 2065 of 4199

 

१प२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ शरीर आदि संबंधी जे पापना भाव अने भगवाननी भक्ति, पूजा इत्यादि संबंधी जे पुण्यना भाव ते पण भगवान! तारामां-आत्मामां नथी, अने आत्मा तेमां नथी; आत्मानुं ते स्थान नथी. आ निर्जरा अधिकार छे ने! तो कर्मनी-अशुद्धतानी निर्जरा कोने थाय? के जेने परमानंदस्वरूप प्रभु आत्माना आनंदनो स्वाद आवे छे तेने अशुद्धता निर्जरी जाय छे.

हा, पण उपवास आदि तप वडे निर्जरा थाय के नहि? धूळेय थाय नहि सांभळने. झीणी वात छे भाई! जेने तुं उपवास कहे छे ए तो विकल्प छे, राग छे; ए वडे कांई निर्जरा न थाय, अशुद्धता न झरी जाय. उपवास नाम निर्मळानंदना नाथ भगवान आत्मानी उप नाम समीपमां वसवुं, तेनो आस्वाद लेवो, तेमां रमवुं ते वास्तविक उपवास छे अने ते वडे निर्जरा थाय छे. कोईने थाय के आ तो निश्चयनी वातो छे, पण भाई! निश्चय एटले ज सत्य. भाई! मारग तो आ छे बापा! अहीं (समयसारमां) तो व्यवहारने अपद कही उथापी नाखे छे. जुओने! आ शुं कहे छे? के व्यवहार होय छे पण ते दुःखरूप छे, अस्थायी छे; ते तारुं पद-स्थान बनवा योग्य नथी, ते तारुं स्वधाम नथी. तारुं धाम एक भगवान आत्मा ज छे अने ते ज अनुभववायोग्य-आस्वादवायोग्य छे.

* गाथा २०३ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘पूर्वे वर्णादिक गुणस्थानपर्यंत भावो कह्या हता ते बधाय, आत्मामां अनियत, अनेक, क्षणिक, व्यभिचारी भावो छे.’

शुं कह्युं? के पहेलां वर्णादिक एटले रंग, गंध आदिथी गुणस्थान पर्यंत जे भावो कह्या हता ते आत्मामां अनियत छे अर्थात् कायम रहेवावाळा नथी. भाई! आ छट्ठुं, तेरमुं अने चौदमुं गुणस्थान आत्मामां अनियत छे. वळी तेओ अनेक छे, क्षणिक छे अने व्यभिचारी छे. भगवाननी भक्ति करतां करतां अने व्रतादि करतां करतां मोक्ष थई जशे एम माननारने आकरुं लागे छे, पण शुं थाय? अहीं तो स्पष्ट कह्युं छे के ते बधा अनियत, क्षणिक, व्यभिचारी भावो छे. छे के नहि अंदर? लोकोने सत्य नाम सत्स्वभाव सांभळवा मळ्‌यो ज नथी एटले ‘निश्चय छे निश्चय छे’-एम कहीने तेने टाळे छे; पण भाई! निश्चय एटले ज सत्य अने व्यवहार एटले उपचार.

हवे कहे छे-‘आत्मा स्थायी छे अने ते बधा भावो अस्थायी छे, तेथी तेओ आत्मानुं स्थान-रहेठाण-थई शकता नथी अर्थात् तेओ आत्मानुं पद नथी.’

जोयुं? नित्यानंदस्वरूप प्रभु आत्मा स्थायी छे अने ते गुणस्थान आदि बधा भावो अस्थायी छे एम कहे छे. भाई! जे भाव वडे तीर्थंकर गोत्र बंधाय