समयसार गाथा-२०३ ] [ १प३ ते भाव पण व्यभिचारी अने अस्थायी भाव छे, ते भाव धर्म नथी केमके धर्मथी कांई बंध न थाय अने जे भावे बंध पडे ते धर्म न होय. आ प्रमाणे आत्मा सिवायना बीजा बधा भाव अस्थायी छे माटे तेओ आत्मानुं स्थान थई शकता नथी. शुभाशुभ विकल्प, दया, दान आदिना विकल्प ने गुणस्थानना भेद आत्मानुं स्थान थई शकता नथी; अर्थात् तेओ आत्मानुं पद नथी.
‘जे आ स्वसंवेदनरूप ज्ञान छे ते नियत छे, एक छे, नित्य छे, अव्यभिचारी छे. आत्मा स्थायी छे अने आ ज्ञान पण स्थायी भाव छे तेथी ते आत्मानुं पद छे.’
अहाहा...! कहे छे-ज्ञानानंदस्वरूप आत्मानुं स्वसंवेदनरूप ज्ञान अथवा स्वनुं- आत्मानुं प्रत्यक्षवेदनरूप ज्ञान नियत छे, कायमी चीज छे, एक छे, अव्यभिचारी छे अने नित्य छे. अहाहा...! जेम जाणगस्वभावी प्रभु आत्मा शाश्वत स्थायी चीज छे तेम तेनुं ज्ञान पण स्थायीभावरूप छे, स्थिर छे, अक्षय छे. तेथी ते आत्मानुं पद छे. तेथी कहे छे-
‘ते एक ज ज्ञानीओ वडे आस्वाद लेवा योग्य छे.’ जोयुं? धर्मी पुरुषो द्वारा ते एक ज आस्वादवायोग्य छे. अहाहा...! धर्मात्माने ते एक ज अनुभववा लायक छे; एक आत्माने निराकुल आनंद ज आस्वादवा लायक छे. हवे आवी वात शुभभावना पक्षवाळाने आकरी लागे, पण बापु! शुभभाव करी करीने तुं अनंतकाळथी रखडी मर्यो छे पण भवभ्रमण मटयुं नथी. भवरहित थवानी चीज तो आत्मानो अनुभव करवो ते एक ज छे.
आ मार्ग भले हो, पण तेनुं कांई साधन तो हशे ने? अहिंसा पाळवी इत्यादि साधन छे के नहि?
उत्तरः– अरे भगवान! तने खबर नथी बापा! भगवान आत्मा अतीन्द्रिय ज्ञान ने आनंदनुं निधान छे. तेनुं स्वसंवेदन एटले पोताथी पोतानामां प्रत्यक्ष आनंदनुं वेदन थवुं ते धर्म छे. ‘अहिंसा परमो धर्मः’ कह्युं छे ने? पण ते अहिंसा कई? के दया, दान, व्रतना विकल्प जेमां न थाय तेवा वीतरागी परिणामनी उत्पत्तिने भगवाने अहिंसा कही छे अने ते परम धर्म छे, अने ते मोक्षनुं साधन छे, दयाना विकल्प कांई साधन नथी; ए तो अपद छे एम अहीं कहे छे. समजाणुं कांई...?
आकरुं लागे के नहि, त्रिलोकनाथ वीतराग परमेश्वरनो आ हुकम छे के-रागथी भिन्न पडीने सच्चिदानंदमय भगवान आत्मानो स्वाद-अनुभव लेवामां आवे त्यारे धर्म थाय छे. आ ज मार्ग छे, आ ज साधन छे. आ सिवाय बहारना क्रियाकांडमां