Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१प४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ जे धर्म माने छे ते नरक-निगोदादि चारगतिमां रझळशे. खरेखर निश्चय ते ज वस्तु छे. व्यवहार होय छे पण ते अवस्तु छे अर्थात् अपद छे. आत्मानो निराकुल स्वाद आव्या पछी पण व्यवहार होय छे पण ते अपद छे, धर्मीने रहेवानुं स्थान नथी. माटे आस्वादवायोग्य एक आत्माना निराकुल आनंदनो ज अनुभव करो एम श्री जयचंदजीए खुलासो कर्यो छे.

*
हवे आ अर्थनो कळशरूप श्लोक कहे छेः-
* श्लोक १३९ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *
‘तत् एकम् एव हि पदम् स्वाद्यम्’ ते एक ज पद आस्वादवायोग्य छे.

आचार्य अमृतचंद्रे आखी टीकानो आ टूंको कलश कर्यो छे. शुं कहे छे एमां? के परमानंदमय भगवान आत्मा ज एक आस्वादवायोग्य-अनुभव करवा लायक छे; रागादि बीजुं कांई अनुभववा योग्य नथी. जुओ, स्त्रीना भोग वखते कांई स्त्रीना शरीरनो जीवने स्वाद नथी. स्त्रीनुं शरीर तो हाड-मांस ने चामनुं बनेलुं अजीव छे, जड माटी छे. धूळ छे. अरूपी एवो भगवान आत्मा तो एने कयारेय स्पर्शतो पण नथी. ते शरीरनो- जडनो स्वाद केवी रीते करे? परंतु ते काळे ‘आ ठीक छे, स्त्रीनुं शरीर सुंदर माखण जेवुं छे’-एवो जे राग थाय छे ते रागने अज्ञानी भोगवे छे. अज्ञानी रागने अनुभवे छे. तेने नथी स्त्रीना शरीरनो अनुभव के नथी आत्मानो अनुभव; मात्र रागनो-झेरनो तेने स्वाद छे. अहीं कहे छे-ते ‘एकम् एव’ एक ज पद स्वाद करवा योग्य छे. अहाहा...! ज्ञानानंदनो सागर प्रभु आत्मा छे; ते एक ज आस्वादवायोग्य छे.

केवुं छे ते पद? तो कहे छे-‘विपदाम् अपदम्’ विपत्तिओनुं अपद छे. अहा... हा... हा...! अतीन्द्रिय आनंदनी मूर्ति प्रभु आत्मा विपत्तिओनुं अपद छे अर्थात् आपदाओ तेमां स्थान पामी शकती नथी. तेना स्वादमां रागनी विपदानो अभाव छे. आवी वात छे तो कहे छे-आ तो बधुं सोनगढनुं निश्चय छे. पण सोनगढनुं कयां छे भाई? आ तो कुंदकुंदाचार्य अने अमृतचंद्राचार्यनुं कथन छे. घणा वखतथी लुप्त थई गयुं एटले तने नवुं लागे छे पण आ सत्य छे. जो तें सत्यने जोवानी आंखो मींची दीधी छे अने रागने ज अनुभवे छे तो तुं अंध छे.

जुओ, अमृतचंद्राचार्य दिगंबर संत महा मुनिवर अंदर अतीन्द्रिय आनंदमां रमता हता. तेमां विकल्प आव्यो अने आ टीका थई गई. तेमां तेओ आ कहे छे के ते टीकानो विकल्प मारुं-आत्मानुं पद नथी. मारा पदमां तो विकल्परूप विपदानो अभाव छे, केमके ते विपदानुं अपद छे, अस्थान छे. अहा... हा... हा...! आनंदधाम-