१प६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७
धूळमांय सुख नथी सांभळने! पांच-पचास लाख के करोड-बे करोड मळे एटले अज्ञानीने एम थई जाय के ‘हुं पहोळो ने शेरी सांकडी;’ पण बापु! ए मानमां ने मानमां तुं अनंतकाळ मरी गयो छे-रखडी मर्यो छे. सांभळने-ए पैसा आदि कयां तारामां छे? जे तारामां नथी एमां तारुं सुख केम होय? अहीं तो आ कह्युं के-शुद्ध चैतन्यना आनंदपद आगळ रागनो-व्रत, तप, भक्ति आदिनो विकल्प पण अपद अर्थात् विपदा भासे छे. अहो! दिगंबर मुनिवरोए एकलुं अमृत रेडयुं छे! आवी वात बीजे कयांय मळे एम नथी.
तो दान करीए तो धर्म थाय के नहि? धूळेय त्यां धर्म न थाय. शानुं दान? शुं पैसा आदि परद्रव्यनुं तुं दान करी शके छे? बीलकुल नहि. तथापि एमां जो रागनी मंदता करी होय तो पुण्य थाय छे, पण ए तो विपदा ज छे. कह्युं ने के-शुद्ध चैतन्यना आनंदपद आगळ रागादि सर्व अपद एटले दुःखनां ज स्थान छे. भाई! आ अरिहंतदेव सर्वज्ञ परमात्मानो हुकम छे. भाई! तें निजपदने छोडीने परपदमां बधुं (सुख) मान्युं छे पण ए मान्यता ज सर्व दुःखनुं मूळ छे.
तो सम्मेदशिखरजीनी जात्रा करो तो पाप धोवाई जाय छे ए तो बराबर छे के नहि?
शुं बराबर छे? अरे! सांभळने बापा! ए जात्रा तो शुभभाव छे अने शुभभाव बधोय विपदा ज छे. हवे आवी वात संप्रदायमां करे तो बहार काढे; पण अहीं तो संप्रदायनी बहार एककोर जंगलमां बेठा छीए. अहाहा...! मारग तो वीतरागनो आ ज छे प्रभु! के आनंदकंद प्रभु आत्मामां जा तो तने पाप धोवाई जाय तेवी अंतरमां जात्रा थशे; बाकी जात्राना विकल्प कोई चीज नथी, अपद छे. त्रणे काळ प्रभु! परमार्थनो आ ज पंथ छे. श्रीमदे कह्युं छे ने के-‘एक होय त्रणकाळमां परमारथनो पंथ.’ बापु! स्वपद सिवायनां अन्य सर्व पद विपदानां ज पद छे.
‘एक ज्ञान ज आत्मानुं पद छे.’ जुओ, छे अंदर? अहाहा...! जे जाणग-जाणग-जाणगस्वभाव अंदर त्रिकाळ शाश्वत छे ते आत्मानुं पद छे. ‘एक ज्ञान ज’-एम कह्युं ने? मतलब के ज्ञान जे अखंड अभेद एकरूप वस्तु छे ते ज आत्मानुं पद छे. अहा... हा... हा...! अभेद एकरूप जे ज्ञायकभाव छे ते ज स्वपद छे एम कहेवुं छे. अहो! दिगंबर संतोए