Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-२०३ ] [ १प७ केवळीनां पेट खोलीने जगतने न्याल करी नाख्युं छे. परंतु वारसो संभाळे तेने ने? भाई! आ तो भगवाननो वारसो संतो मूकता गया छे; तेने संभाळ; तुं न्याल थई जईश. अरेरे! अज्ञानीने तेनी दरकार नथी!

कहे छे-‘एक ज्ञान ज आत्मानुं पद छे. तेमां कोई पण आपदा प्रवेशी शकती नथी. अने तेनी आगळ अन्य सर्व पदो अपदस्वरूप भासे छे.’

ल्यो, स्वपदमां-चिदानंदघनस्वरूप प्रभु आत्मामां कोई पण आपदा प्रवेशी शकती नथी. अहाहा...! आत्मा एकलो चिद्घन-चैतन्यनो घन प्रभु छे. तेमां रागादि आपदा केम प्रवेशे? प्रवेशी शके ज नहि. अने तेनी आगळ अन्य सर्व पदो अपदस्वरूप ज भासे छे केमके तेओ आकुळतामय ज छे. आ व्रत, तप, भक्ति, पूजा, जात्रा इत्यादिना विकल्प आकुळतामय ज छे. ल्यो, आवुं! पण एने बेसे केम? भगवाननी भक्ति आकुळतामय छे, दुःखरूप छे, आपत्तिरूप छे एवुं एने बेसे केम? भाई! अशुभथी बचवा भगवाननी भक्ति आदिनो शुभराग ज्ञानीने पण आवे छे, पण छे ए आकुळतामय. क्रियाकांडवाळाने आकरुं लागे ने राड नाखे; एम के-भगवाननी भक्तिथी मुक्ति न थाय? एम बिचारो वलोपात करे, दुःख करे. पण भाई! शुं थाय? (ज्यां मार्ग ज आवो छे त्यां शुं थाय?)

दिगंबर संत पद्मनंदी मुनिवरे ‘पद्मनंदी पंचविंशतिमां ब्रह्मचर्यनी बहु व्याख्या करी छे. ब्रह्मचर्य कहेवुं कोने? ब्रह्म नाम आनंदस्वरूप आत्मा तेमां चरवुं ते ब्रह्मचर्य छे. एनी व्याख्या करतां छेल्ले कह्युं के-हे युवानो! मारी आ व्याख्या तमने न बेसे तो माफ करजो. अहा! प्रचुर आनंदनी मस्तीमां झूलनारा दिगंबर संत आम कहे छे के हे युवानो! तमने आ वात न गोठे तो माफ करजो, केमके अमे मुनि छीए. (मतलब के अमारी पासे बीजी शी वात होय?) तेम अहीं संतो कहे छे के-भाई! अमे आ वात कहीए छीए ते तने न रुचे, न गोठे तो माफ करजे भाई! पण भगवाननो कहेलो मारग तो आ ज छे. बापा! क्रियाकांड कोई मारग नथी.

पद्मनंदीस्वामी नग्न दिगंबर संत आत्माना आनंदमां रमनारा आत्मज्ञानी- ध्यानी मुनिवर हता. तेमणे ब्रह्मचर्यनुं व्याख्यान करतां एवी व्याख्या करी के-आ शरीर केळना गर्भ जेवुं तुं माने छे पण आ तो हाड-मांस अने चामडुं छे. अरे! तेने तुं चुंथवामां आनंद माने छे? मूरख छो, पागल छो? शुं थयुं छे तेने! अहा! जाणे शरीरने भोगवतां एमांथी शुं लई लउं? हाड-मांसमांथी शुं लई लउं? एवी पागलनी चेष्टा करे छे? छेल्ले कहे छे-तने आवी व्याख्या ठीक न पडे-एम के युवान अवस्था होय, फुटडुं शरीर होय, इन्द्रियो पृष्ट होय ने स्त्री पण रूपाळी होय, भोगनी रुचि होय ने पैसा पण करोड-बे करोड होय एटले तने मारी वात