Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१प८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ न रुचे तो माफ करजे भाई! हुं तो मुनि छुं. तेम जेने पुण्यनी रुचि छे, व्यवहाररत्नत्रयने धर्म माने छे तेने आ वात ठीक न पडे तो कहे छे-माफ करजे भाई! (अमे तो निश्चयमां लीन छीए). मार्ग तो आ ज छे.

*
वळी कहे छे के आत्मा ज्ञाननो अनुभव करे छे त्यारे आम करे छेः-
* कळश १४०ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *
‘एक–ज्ञायकभाव–निर्भर–महास्वादं समासादयन्’ एक ज्ञायकभावथी भरेला

महास्वादने लेतो,..’

अ... हा... हा... हा...! शुं कहे छे? के भगवान आत्मा एक ज्ञायकस्वभावथी - ध्रुवस्वभावथी भरेलो छे. तेना ‘महास्वादने लेतो’... छे अंदर? एटले के राग उपरथी, निमित्त उपरथी अने भेद उपरथी पण द्रष्टि उठावीने धर्मात्मा अभेद एक ज्ञायकभाव, ध्रुवस्वभावभाव, ज्ञानानंदभावनो आस्वाद ले छे. ‘एक ज्ञायकभाव’-एम कह्युं ने? एटले के एकली ज्ञान-ज्ञान-ज्ञानमात्र वस्तु-जे देह-मन-वाणीथी भिन्न, कर्मथी भिन्न, पुण्य-पापना विकल्पोथी भिन्न अने (विकारी-निर्विकारी) पर्यायना भेदथी पण भिन्न छे- तेनो सम्यग्द्रष्टि आस्वाद ले छे अने ते महास्वाद छे. गजब वात छे भाई! ज्ञानी महास्वादने ले छे-एटले शुं? एटले के ते निरुपम अतीन्द्रिय आनंदना स्वादने आस्वादे छे. अहा! ज्ञानी, शुद्ध जाणग-जाणग-जाणगस्वभावी जे आत्मा छे तेमां एकाग्र थईने अतीन्द्रिय आनंदना महास्वादने अनुभवे छे-माणे छे.

भगवान आत्मा त्रिकाळी एकरूप परमानंदमूर्ति प्रभु एक ज्ञायकभावथी भरेलो छे. आवा निजस्वरूपमां एकाग्र थतां ज्ञानीने जे स्वाद आवे छे ते महास्वाद छे अर्थात् तेमां कोई बीजो स्वाद आवतो नथी. शुं कह्युं ए? के अतीन्द्रिय आनंदना स्वादिया ज्ञानीने ते स्वादना काळे बीजे कोई भेदनो, रागनो के व्यवहारना विकल्पनो स्वाद आवतो नथी. अहा! अज्ञानी तो आ व्रत करो, ने तप करो ने भक्ति करो -एम रागना स्वादमां-झेरना स्वादमां संतुष्ट थई जाय छे. अहीं कहे छे-आत्माना अतीन्द्रिय आनंदना स्वादमां बीजो स्वाद छे नहि. आनुं नाम धर्म अने आ वीतरागनो मार्ग छे. एकान्त छे, एकान्त छे-एम रागमां ज हरखाई जता अज्ञानीओ राडो पाडे पण भाई! आ सम्यक् एकांत छे अने वस्तुनो स्वभाव ज आवो (सम्यक् एकान्त) छे. भाई! धर्म एने कहीए के जेवो पोतानो एक ज्ञानानंदस्वभाव छे तेवो तेनो पर्यायमां अनुभव करवो-आस्वाद करवो. आ सिवाय बीजो-रागनो अनुभव-धर्म छे नहि. समजाणुं कांई...?

कहे छे-पोताना स्वरूपनो स्वाद लेतां बीजो स्वाद आवतो नथी अर्थात्