Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 2072 of 4199

 

समयसार गाथा-२०३ ] [ १प९ निर्मळानंदनो नाथ शुद्ध चिद्रूपस्वरूप प्रभु आत्मानी सन्मुख थईने स्वाद लेतां अतीन्द्रिय आनंदना वेदन सिवाय बीजो स्वाद आवतो नथी. माटे ‘द्वन्द्वमयं स्वादं विधातुम् असहः’ द्वंद्वमय स्वादने लेवा असमर्थ छे. द्वंद्वमय स्वाद एटले शुं? के जे रंग- गंध आदि छे ते, जे दया-दान आदिनो राग छे ते अने क्षयोपशम आदि जे भेद छे ते-ए बधानो स्वाद छे ते द्वंद्वमय स्वाद छे; ज्ञानी ते द्वंद्वमय स्वादने लेवा असमर्थ छे अर्थात् शुद्ध नित्यानंदस्वरूपना अतीन्द्रिय स्वादने अनुभवतां तेने द्वंद्वमय (इन्द्रियजन्य) स्वाद होतो नथी.

कोईने वळी थाय के-आ ते वळी (अतीन्द्रिय) स्वाद केवो हशे? एम के- मैसूबनो, साकरनो, रसगुल्लांनो, स्त्रीना देहना भोगनो तो स्वाद होय छे पण आ स्वाद केवो हशे?

समाधानः– भाई! सांभळ बापा! ए मैसूब, रसगुल्लां अने स्त्रीना देहादिनो स्वाद तो भगवान आत्माने होतो ज नथी कारण के ए तो बधा जड रूपी पदार्थो छे. अरूपी चैतन्यमय प्रभु आत्माने जड रूपीनो स्वाद केम होय? ए जडनो स्वाद तो जडमां रह्यो; आत्मा तो ए जड पदार्थोने अडतोय नथी. समजाणुं कांई...? हा, ए जड पदार्थो प्रत्ये लक्ष करीने जीव राग करे छे के ‘आ ठीक छे’ अने एवा रागनो स्वाद अज्ञानीने होय छे. पोताना चिदानंदमय भगवानने छोडीने पर पदार्थ प्रत्ये वलण करीने अज्ञानी जीव रागादि करे छे अने ते रागादिनो कषायलो दुःखमय स्वाद तेने आवे छे. अहीं कहे छे-रागथी भिन्न पडीने आनंदकंद प्रभु आत्मामां जईने जेणे अतीन्द्रिय आनंदनो स्वाद लीधो छे तेने बीजो स्वाद-रागनो ने भेदनो स्वाद-आवतो नथी. आवो स्वानुभवनो स्वाद रागना स्वादथी भिन्न अलौकिक छे. अनुपम छे.

जुओ, आमां द्रव्य-गुण-पर्याय एम त्रणे बोल आवी गया. १. पोते एक ज्ञायकभावथी भरेलो छे, कोण? के आत्मा-द्रव्य. २. पोते एक ज्ञायकभावथी भरेलो छे-तेमां जे ज्ञायकस्वभाव छे ते गुण छे अने ३. ज्ञायकभावमां एकाग्र थईने अतीन्द्रिय महास्वाद लेवो ते पर्याय छे. आ प्रमाणे भगवान आत्मा पूर्णानंदनो नाथ प्रभु एक ज्ञायकभावथी भरेलो छे तेनो अंतरएकाग्रता करी अनुभव करतां-तेनो आस्वाद लेतां द्रव्य-गुण अने पर्याय त्रणे निर्मळ सिद्ध थई जाय छे अने त्यां बीजा स्वादनो-विपदामय स्वादनो अभाव छे. दया, दान, भक्ति, पूजा इत्यादिना विकल्पनो स्वाद विपदानो स्वाद छे अने तेनो अतीन्द्रिय महास्वादमां अभाव छे. दया, दान आदि विपदानो स्वाद तो मिथ्याद्रष्टिपणामां आवे छे ज्यारे शुद्ध एक ज्ञायकने अनुभवता समकितीने तो अतीन्द्रिय आनंदनो महास्वाद होय छे अने तेमां बीजो कषायलो स्वाद होतो नथी. अहो! गजब व्याख्या छे.