१६० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७
जेम साकर एक मीठाशना स्वभावथी भरेली छे, जेम मीठुं एकला खारापणाना स्वभावथी भरेलुं छे तेम भगवान आत्मा एक ज्ञायक-ज्ञायक-ज्ञायकस्वभावथी भरेलो छे. तेमां अंतर्द्रष्टि करतां अने तेमां ज स्थिर थतां अतीन्द्रिय आनंदनो महास्वाद आवे छे; ज्ञानी ते महास्वादने अनुभवे छे. आवुं लोकोए कोई दि’ सांभळ्युंय न होय, प्रभु! तुं कोण छो तेनी तने खबर नथी बापु! पण तुं अतीन्द्रिय ज्ञान अने आनंदथी भरेलो शुद्ध चैतन्यस्वभावमय पदार्थ छो. तेनो पर्यायमां स्वीकार करतां अतीन्द्रिय आनंदनो महास्वाद आवे छे जेनी आगळ इन्द्रनां इन्द्रासन अने हजारो-क्रोडो अप्सराओना भोग सडेलां मींदडां जेम दुर्गंध मारे तेवा दुर्गंधमय लागे छे. अहो! आवो चैतन्यमहाप्रभुनो आस्वाद अद्भुत अलौकिक छे!
कहे छे-अतीन्द्रिय आनंद रसनो रसियो एवो ज्ञानी द्वंद्वमय स्वाद लेवामां असमर्थ छे; एटले के त्रण बोलनो एने स्वाद नथी.
१. रंग, रस, गंध, स्पर्शनो स्वाद लेवामां अर्थात् रूपाळो सुंदर देह होय वा अन्य भोजनादिरूपी पदार्थो होय तेनो स्वाद लेवामां ते असमर्थ छे एटले के अयोग्य छे. जडनो-धूळनो स्वाद तेने होई शकतो नथी.
२. रागनो-पुण्य-पापना शुभाशुभभावोनो जे कषायलो दुःखमय स्वाद छे ते स्वाद लेवा ते असमर्थ छे अर्थात् तेवो स्वाद तेने आवतो नथी.
३. क्षयोपशमादि ज्ञानना जे भेदो ते भेदनो पण स्वाद तेने होतो नथी. पर्यायमां जे ज्ञाननो विकास छे ते भेद छे अने ते भेदनो स्वाद ज्ञानीने आवतो नथी. अहा... हा... हा...! जेने अरस, अरूप, अगंध, अराग, अभेद एवा चैतन्यमहाप्रभुनो स्वाद प्रगट होय तेने रस-रूप, गंध, भेद अने रागनो द्वंद्वमय स्वाद केम होय? न होय. अहा! मारग बापु! आवो छे. अरे! आ अवसरे मारगनुं ज्ञानेय न करे ने श्रद्धानेय न करे तो कयां जईश प्रभु! कयांय संसारसमुद्रमां खोवाई जईश हों. (पछी अनंतकाळे अवसर नहि आवे).
तो रहस्यपूर्ण चिठ्ठीमां सविकल्पद्वार वडे निर्विकल्प अनुभव थवानुं विधान छे ते केवी रीते छे?
समाधानः– स्वानुभवनी निर्विकल्प दशा थवा पहेलां स्व-परना भेदज्ञान-संबंधी विकल्प उठता होय छे तथा एना विचार पण छूटी ‘हुं शुद्ध छुं, एकरूप चिद्रूपस्वरूप छुं’ एवा स्वरूप संबंधी सूक्ष्म विकल्प थता होय छे अने पछी ते विकल्प पण छूटी परिणाम स्वरूपमां मग्न थईने स्वरूप केवळ चिन्मात्र भासवा लागे छे. आवी स्वानुभवनी अतीन्द्रिय आनंदनी दशा जे प्रगटे तेमां कांई विकल्पनो स्वाद