समयसार गाथा-२०३ ] [ १६१ होतो नथी, तेनो तो त्यां अभाव होय छे. सविकल्पद्वार वडे निर्विकल्प अनुभव थवानुं कहेवुं ए तो निमित्तनुं ज्ञान कराववा माटेनुं उपचार कथन छे. समजाणुं कांई...?
स्वां वस्तुवृत्तिं विदन्’ आत्माना अनुभवना-स्वादना प्रभावने आधीन थयो होवाथी निज वस्तुवृत्तिने जाणतो-आस्वादतो...
अतीन्द्रिय आनंदनो स्वाद अनुभवतां ते तेना प्रभावने आधीन थई जाय छे. एटले शुं? के आत्माना अतीन्द्रिय आनंदना स्वादना अनुभवनमांथी ते बहार आवतो नथी. अहाहा...! आत्माना अनुभवना अनुभाव एटले प्रभावथी विवश-आधीन थयो होवाथी ते निज वस्तुवृत्तिने-चैतन्यनी शुद्ध परिणतिने जाणे छे-आस्वादे छे. प्रभु! आ तारो मारग तो जो! आ मारग विना तारा भवना निवेडा नहि आवे भाई!
आ शरीर तो हाड-मांस ने चामडां छे. तेनुं जेने आकर्षण थयुं छे तेने आत्माना निराकुल आनंदनो अभाव छे. अने ज्यां आत्माना अनुभवनो प्रभाव आव्यो त्यां परनुं आकर्षण छूटी जाय छे अने एनुं नाम सम्यग्दर्शन अने धर्म छे. अज्ञानी तो दान-शील- तप-भक्तिमां धर्म माने छे. पण भाई दान देवुं, शरीरथी ब्रह्मचर्य पाळवुं, उपवास आदि करवा अने भगवाननी भक्ति करवी-ए तो बधो राग छे. अरे भाई! सांभळ तो खरो! मारग तो नाथ! तारो कोई बीजो अलौकिक मार्ग छे. रागमां धर्म माननारा तो बापु! लुंटाई जशे, अरे! लुंटाई ज रह्या छे.
अहाहा...! प्रभु! तुं कोण छो? के आत्मानो-निराकुळ आनंदनो स्वाद-आस्वाद लेतो थको आत्माना निरुपम स्वादना अनुभवनमांथी बहार न नीकळे तेवो आ आत्मा छो. ‘एषः आत्मा’ एम कह्युं छे ने? ‘आ आत्मा छो;’ मतलब के स्वानुभवना स्वादमां जे प्रत्यक्ष थयो छे ते आ आत्मा छो-एम कहे छे. वळी ज्यारे आत्मा प्रत्यक्ष थयो त्यारे ते ‘विशेष–उदयं भ्रश्यत्’ ज्ञानना विशेषोना उदयने गौण करतो, ‘सामान्यं कलयत् किल’ सामान्यमात्र ज्ञानने अभ्यासतो, ‘सकलं ज्ञानं’ सकळ ज्ञानने ‘एकतां नयति’ एकपणामां लावे छे-एकरूपे प्राप्त करे छे.
जुओ, आत्मा स्वानुभवना काळे ज्ञाननी जे पर्याय-अवस्था छे ते अवस्थाना भेदने गौण करे छे; अभाव करे छे एम नहि पण गौण करे छे, अने त्रिकाळी ज्ञायकभावने मुख्य करे छे. -निर्मळ ज्ञानना भेदोने पण लक्षमां-द्रष्टिमां लेतो नथी तो पछी देव-गुरुनी भक्ति करो तो कल्याण थई जशे ए वात तो कयांय रही गई. भाई! देवेय तुं ने. गुरुय तुं अने धर्म पण तुं ज छो. देवनो देव प्रभु! तुं आत्मा पूर्णानंदनो नाथ छो, गुरु पण भगवान! तारो तुं ज छो अने वीतरागतामय धर्म