१६२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ पण तुं ज छो. अहा! रागनी उत्पत्ति न थवी अने आत्माना आनंदनी उत्पत्ति थवी ते अहिंसामय-वीतरागतामय धर्म छे, अने ते ताराथी भिन्न नथी, अभिन्न छे. आवी व्याख्या अभ्यास नहि एटले लोकोने आकरी लागे. वळी बहार बीजे आवी प्ररूपणा पण बंध थई गई छे. बहार बीजे तो दान करो, उपवास करो इत्यादि करो-करोनी प्ररूपणा चाले छे. पण भाई! आवुं स्वरूपनुं भान कर्या विना बीजी रीते धर्म नहि थाय.
प्रभु! एक वार सांभळ तो खरो! तारी चीज छे के नहि अंदर? छे; छे तो परिपूर्ण स्वभावथी छे के अपूर्ण स्वभावथी? परिपूर्ण स्वभावथी छे तो अभेद छे के भेदरूप? अहाहाहा...! भगवान! तुं अभेद एकरूप परिपूर्ण ज्ञायकभावथी भरेलो आत्मा छो. अहाहाहा...! तेनी समीप जतां जे महास्वाद आवे छे-निराकुल आनंदनो आस्वाद आवे छे ते वस्तुवृत्ति अर्थात् वस्तुनी परिणति छे. छे अंदर? आत्मानी ते शुद्ध परिणति छे. ‘निज वस्तुवृत्तिने आस्वादतो’-अहाहाहा...! शुं भाषा छे! अने भाव! भाव महा गंभीर छे. पोतानी शुद्ध परिणति अर्थात् अंतरमां आनंदना स्वादनी दशा ते पोतानी वस्तुनी वृत्ति छे; व्यवहाररत्नत्रयनो राग ते वस्तुनी वृत्ति नथी, पोतानी वृत्ति नथी. लोकोने आ आकरुं लागे छे पण शुं थाय? प्रभु! मारग तो आ ज छे. तने एकांत लागे, निश्चयाभास लागे ने व्यवहारनो लोप थाय छे एम लागे तोय मारग तो आ ज (सत्य) छे. दया, दान, व्रत, आदि विकल्पना रागमां तो बापु! तारी त्रिकाळ आनंदनी शक्तिनो स्वभाव हणाई जाय छे. पुण्यना प्रेममां जेम घाणीमां तल पीलाई जाय तेम तुं चोरासीना चक्करमां पीलाई गयो छे ए जो तो खरो प्रभु!
अहा! स्वरूपनो स्वाद लेवामां जे वीतरागी आनंदनी परिणति उत्पन्न थाय छे ते, वस्तुनी वृत्ति छे, आत्मानी परिणति छे. अहाहाहा...! निज आनंदरसना रसिया ए पचीस-पचीस वर्षना जुवानजोध राजकुमारो-चक्रवर्ती ने तीर्थंकरना पुत्रो मात-पिता ने पत्नीनो त्याग करीने एक मोरपींछी अने एक कमंडळ लईने जंगलमां चाली नीकळे ए केवी अद्भुत अंतरदशा! केवो वैराग्य! तेओ माताने कहे छे-हे माता! अमे रागनो त्याग करीने हवे अंदर चैतन्यमां जवा मागीए छीए. अहा! आनंदनो नाथ तो अनुभवमां आव्यो छे पण अमारे हवे अंदरमां विशेष-विशेष रमणता करवी छे; अंदरमां ठरी जवुं छे; माता रजा दे. आ अंदरमां-आनंदना स्वादमां उग्रपणे रमवुं अने ठरवुं एनुं नाम चारित्र छे. व्रतादिनो राग कांई चारित्र नथी.
माता! एक वार रोवुं होय तो रोई ले, पण बा! अमे हवे फरीने मा नहीं करीए, जनेता नहि करीए; अमे तो अमारा आनंदमां घूसी जईशुं, एवा घूसी जईशुं के फरीने अवतार नहि होय. आवा चिदानंदरसना रसियाओने निजानंदरसमां