Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-२०३ ] [ १६३ घूसी जाय त्यारे जगत आखुं बेस्वाद-झेर जेवुं लागे छे. व्रतादि रागना स्वाद तेमने झेर जेवा लागे छे. आवो वीतरागनो मार्ग प्रभु! वीतरागता वडे ज प्रगट थाय छे.

अहाहाहा...! शुं कहे छे? के स्वरूपना स्वादना अनुभवमांथी बहार न आवतो आ आत्मा आत्माना विशेषोना उदयने गौण करे छे. आ दया पाळो ने व्रत करो ने तप करो इत्यादि रागनी वात तो कयांय रही, अहीं तो आनंदकंद प्रभु आत्मानी पर्यायमां जे भेदरूप विशेषो छे ते विशेषोने गौण करे छे अर्थात् विशेषनुं लक्ष छोडीने त्रिकाळी एकरूप सामान्यमां घूसे छे. ओहोहोहो...! आ तो गजबनो कळश छे! आचार्य अमृतचंद्रदेवे एकलो अमृतनो रस रेडयो छे! कहे छे-प्रभु! तुं अमृतनो सागर छो ने! तेमां निमग्न थतां एकला अमृतनो स्वाद आवे छे, राग अने भेदनो स्वाद त्यां भिन्न पडी जाय छे, गौण थई जाय छे. एकरूप त्रिकाळी ध्रुव चैतन्यसामान्य अभेद आनंदस्वरूपनो-अमृतनो स्वाद लेतां भेदनो स्वाद गौण थई जाय छे. हवे आमां रागनी वात कयां रही? व्यवहाररत्नत्रयना रागथी पोताने लाभ छे एम माननारे तो भाई! मारग घणो विपरीत करी नाख्यो छे.

चित्सामान्य प्रभु आत्मामां झुकतां स्वाद अभेदनो आवे छे; ज्ञान ज्यां अभेदनुं थयुं तो स्वाद पण अभेदनो आवे छे. झीणी वात छे भाई! आ दिगंबर धर्म -सनातन वीतरागनो मारग छे बापा! ए तो सांभळवाय महाभाग्य होय तो मळे छे. कहे छे- ज्ञानी ज्ञाननो अभ्यास करे छे अर्थात् अभ्यासमां लेवा माटे ते सामान्यमात्र ज्ञाननो अनुभव करे छे. अहाहाहा...! सामान्य एकरूप जे ज्ञायकभाव तेनो अभ्यास नाम वेदन ज्ञानी करतो होय छे. आबाल-गोपाल सौने माटे मारग तो आ छे. १७-१८ मी गाथामां आवे छे ने के-भगवान! तारी वर्तमान ज्ञाननी पर्याय जे छे तेमां ज्ञायकभाव जाणवामां आवे छे केमके ज्ञाननी जे पर्याय छे तेनो स्वभाव तो स्वपरप्रकाशक छे. बापु! ज्ञायक ज तारा ज्ञानमां आवे छे पण द्रष्टि तारी ज्ञायक पर नथी, पर्याय पर छे. अज्ञानीनी द्रष्टि ज्ञायक पर नथी पण पर्याय पर छे. तेथी ते निज स्वरूपने भूली जई पर्याय ज पोतानुं सर्वस्वरूप छे एम माने छे. परंतु ज्ञानीनी द्रष्टि शुद्ध ज्ञायक पर छे, पर्याय पर नथी; तेथी ते सामान्यमात्र ज्ञायकभावनो अभ्यास नाम अनुभव करतो होय छे. अहा! आवो मारग कोई विरल पुरुषो ज धारण करे छे. योगसारमां आवे छे ने के-

‘‘विरला जाणे तत्त्वने, वळी सांभळे कोई;
विरला ध्यावे तत्त्वने, विरला धारे कोई.’’

कोई विरल शूर पुरुषो ज आ मार्गने सांभळे छे अने एमांय कोईक विरल ज मार्गने पामे छे. बापु! आ तो सर्वज्ञदेवनो-वीतराग परमेश्वरनो मार्ग छे, एमां कायरनुं कांई काम नथी. श्रीमदे कह्युं छे ने के-