१६४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७
अहा! भगवाननी वाणी हिजडा जेवा कायरोने प्रतिकूळ लागे छे. भाई! जेने पुण्यनी-शुभरागनी रुचि छे ते कायर ने नपुंसक छे; शास्त्रमां रागनी रुचिवाळाने नपुंसक कह्यो छे केमके तेने आत्माना अंतर-पुरुषार्थनी खबर नथी. तेणे रागनी रुचिमां आखुं वीर्य रोकी दीधुं छे. जेम नपुंसकने प्रजा न थाय तेम रागनी रुचिवाळाने धर्मनी प्रजा थती नथी.
आत्मा अतीन्द्रिय अनाकुळ आनंदरसथी भरेलो चिदानंदमय भगवान छे. ज्ञानी तेनो आस्वाद लेतो, सामान्यमात्र ज्ञाननो अभ्यास-अनुभव करतो सकल ज्ञानने एकपणामां लावे छे अर्थात् पर्यायना भेदने छोडीने एकरूप ज्ञानमां एकाग्र थाय छे, एक ज्ञानमात्र भावने प्राप्त करे छे; जेवो एकरूप सामान्य ज्ञायकस्वभाव छे तेवो पर्यायमां एकरूपे प्राप्त करे छे, अनुभवे छे. व्यवहारनी रुचिवाळाने आवुं आकरुं लागे तेवुं छे. परमार्थवचनिकामां आवे छे ने के-आगमपद्धति जगतने सुलभ छे, अर्थात् दया, दान, व्रत, भक्ति इत्यादि क्रियाकांडनो व्यवहार आगमपद्धति छे ते जगतने सुलभ छे. पण अध्यात्मनो व्यवहारेय तेओ जाणता नथी. शुद्ध चैतन्यस्वरूपना आश्रये उत्पन्न वीतरागी परिणति ते अध्यात्मनो व्यवहार छे; आनंदनो स्वाद आवे ते अध्यात्मनो व्यवहार छे अने आनंदस्वरूपी आत्मद्रव्य ते निश्चय छे. निश्चय स्वरूपना अनुभव विना अज्ञानी अध्यात्मना व्यवहारने जाणतो नथी. तेथी बाह्य क्रिया करतो थको मूढ जीव मोक्षमार्ग साधी शकतो नथी.
कोईने वळी थाय के करवुं-धरवुं कांई नहि ने आत्मा-आत्मा-आत्मा, बस आत्मानो अनुभव-आ ते शुं मांडयुं छे? आम दुनियाना लोकोने आत्मानुभवनी वात कहेनारा धर्मी जीवो पागल जेवा लागे छे. पण शुं थाय? परमात्म प्रकाशमां आवे छे के- दुनियाना पागल लोको धर्मात्माने पागल कहे छे. हा, पागलोनी सर्वत्र आवी ज चेष्टा होय छे. बापु! पागलपणाथी छूटवानो आ एक ज मार्ग छे. समजाणुं कांई...?
कहे छे-सकळ ज्ञानने ज्ञानी एकत्वमां लावे छे. एटले के भेदनुं लक्ष छोडीने निज एकत्वने ज्ञानी ध्यावे छे अर्थात् एकरूप शुद्ध चिद्रूप स्वरूपनी ज्ञानी प्राप्ति करे छे. आनुं नाम ते आत्मानो स्वाद, सम्यग्दर्शन अने धर्म छे. आनुं नाम सम्यग्दर्शन-ज्ञान- चारित्ररूप मोक्षमार्ग छे.
‘आ एक स्वरूपज्ञानना रसीला स्वाद आगळ अन्य रस फिक्का छे.’ जोयुं? स्वरूपज्ञाननो स्वाद रसीलो छे, रसमय-आनंदमय छे. भगवान आत्मा त्रिकाळ