समयसार गाथा-२०३ ] [ १६प ज्ञानानंदस्वरूप छे. आवा पोताना स्वरूपमां लीन थई प्रवर्ततां आनंदनो-निराकुळ आनंदनो रसमय स्वाद आवे छे. अहा! आवा निजरसना रसीला स्वाद आगळ अन्य रस फिक्का छे एम कहे छे. आ स्त्री आदिना शरीर तो धाननां ढींगलां छे. जो बे दिन धान न मळे तो फिक्कां फच पडी जाय छे; कोई सामुंय न जुए हें! परंतु इन्द्राणीओ जेने हजारो वर्षे आहारमां कंठमांथी अमृत झरे छे तेमना भोग पण ज्ञानीने दुःखरूप लागे छे, विरस लागे छे-एम कहे छे. कह्युं छे ने के-
अहाहाहा...! कहे छे अन्य रस फिक्का लागे छे. एक स्वरूपज्ञानना रसीला स्वाद आगळ-अतीन्द्रिय आनंदना स्वाद आगळ-वीतरागी स्वादनी आगळ जगतना भोगना, विषयना ने आबरूना स्वाद फिक्का लागे छे. ‘तमे तो महान छे, बहु उदार छो’ इत्यादि बहु प्रकारे प्रशंसा करवामां आवतां अज्ञानी राजी-राजी थई जाय छे; तेमा तेने रागनो (होंशनो) रस आवे छे. परंतु ज्ञानीने ते रस फिक्को लागे छे. अज्ञानी रागना रसमां रसबोळ थई जाय छे. ज्यारे ज्ञानीने स्वरूपना स्वाद आगळ बीजा बधा स्वाद फिक्का- बेस्वाद लागे छे. भाई! ज्ञानी ने अज्ञानीनी रुचिमां बहु फेर छे. (एकने स्वरूपनी रुचि छे, बीजाने रागनी).
हवे कहे छे-‘वळी स्वरूपज्ञानने अनुभवतां सर्व भेदभावो मटी जाय छे.’ अहाहाहा...! ज्ञान ने आनंद जेनुं रूप नाम स्वरूप छे एवा भगवान आत्मानो अनुभव करतां सर्व भेदभावो मटी जाय छे. एटले शुं? एटले के आ मतिज्ञान, श्रुतज्ञान इत्यादि ज्ञाननी पर्यायना भेद द्रष्टिमां आवता नथी; एक मात्र चिन्मात्र स्वरूपनो अनुभव रहे छे. वळी कहे छे-
‘ज्ञानना विशेषो ज्ञेयना निमित्ते थाय छे. ज्यारे ज्ञान सामान्यनो स्वाद लेवामां आवे त्यारे ज्ञानना सर्व भेदो पण गौण थई जाय छे, एक ज्ञान ज ज्ञेयरूप थाय छे.’
शुं कहे छे? के पोतानी ज्ञाननी पर्यायमां जे विशेषो-भेद पडे छे ते भिन्न-भिन्न ज्ञेयना निमित्ते पडे छे. परंतु ज्यारे ज्ञानसामान्यनो अर्थात् अखंड एकरूप त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायकभावनो स्वाद लेवामां आवे छे त्यारे बधा भेदभाव गौण थई जाय छे; एक ज्ञान ज ज्ञेयरूप थाय छे; पोतानुं त्रिकाळी स्वरूप ज पर्यायमां ज्ञेयरूप थाय छे. अहाहाहा...! स्वरूपनो स्वाद लेवामां आवतां परनुं जाणवुं जे अनेक प्रकारे छे ते बधु गौण थई जाय छे अने एक शुद्ध चिन्मात्र स्वरूप ज ज्ञेयरूप थाय छे. अहो! गजबनो कळश छे!