निश्चयनय. केमके प्रमाणमां पर्यायनो निषेध आवतो नथी. निश्चयनयमां पर्यायनो निषेध आवे छे. तेथी निश्चयनय शुद्ध छे. (पूज्य छे). (निश्चयनय एकने ज विषय करे छे अने एक छे ते ज शुद्ध छे).
ज्ञानानंद एकरूप वस्तु आत्मा तेने सत्यार्थ कही शुद्धनय कह्यो. नय अने नयना विषयनो भेद त्यां काढी नाखीने त्रिकाळीने शुद्धनय कह्यो छे. अहीं कहे छे के एवी सत्यार्थ अबद्धस्पृष्ट त्रिकाळी जे चीज तेनी अनुभूति ते शुद्धनय छे. त्रिकाळी सत्यार्थ वस्तुमां झूकीने एकाग्र थतां जे अनुभूति थाय छे ए अनुभूतिमां त्रिकाळीनो यथार्थ निर्णय थाय छे अने ते शुद्धनय छे.
सविकल्प निर्णय प्रथम होय छे. १३ मी गाथामां आव्युं ने के अज्ञानीना (वेदांतादिना) अभिप्रायथी भिन्न भगवाने जेवुं वस्तुतत्त्व कह्युं छे तेवुं सिद्ध करवा प्रथम नय, निक्षेप, प्रमाणथी विकल्पपूर्वक निर्णय करे छे पण ए कोई वास्तविक निर्णय नथी. वस्तुतत्त्वनो अनुभव करीने निर्णय करवो अने ए निर्विकल्प अनुभूतिमां वस्तु आ ज्ञायक शुद्ध छे एवो भास थई जवो एने यथार्थ निर्णय अने शुद्धनय कहे छे.
वेदांत कहे छे एवो शुद्ध आत्मा छे नहीं. आ तो शुद्ध छे एवो पर्यायमां अनुभव थवो एने शुद्ध कहे छे. वेदांत तो पर्यायने मानतो ज नथी. वेदांत साथे जैनधर्मने कोई मेळ नथी.
वळी कोई एम कहे छे के कुंदकुंदाचार्यदेवे समयसारने वेदांतना ढांचामां ढाळी दीधुं छे. एवा लोकोने कांई खबर ज नथी. वेदांत ए कोई चीज छे? वेदांतमां द्रव्य, गुण, पर्याय क्यां छे? भाई! आ तो सर्वज्ञदेव वीतरागनी वाणी छे. आवी वात बीजे छे ज कयां? अहाहा...! आत्मा अनंत गुणनो पिंड त्रिकाळी ध्रुव शुद्ध छे अने एवा शुद्ध एनी अनुभूति थवी ए शुद्धनयछे. आ अनुभूति ए आत्मा ज छे. आवी वात बीजे कयांय नथी.
ए अनुभूति आत्मा ज छे. एने शुद्धनय कहो, आत्मा कहो ए बधुं एक ज छे, अलग नथी. अहीं अलग नथी ए आखी चीजनी अपेक्षाए वात छे. निश्चयथी अनुभूति ए तो द्रव्यनुं परिणाम छे, द्रव्य नथी. ए द्रव्यथी भिन्न छे. परंतु जेवुं द्रव्य त्रिकाळ शुद्ध छे तेवी शुद्धनी जे अनुभूति थई ते अनुभूति आत्मानी जातनी ज छे तेथी आत्मा ज छे एम कह्युं छे. जेम राग भिन्न चीज छे तेम अनुभूति भिन्न नथी तेथी