आत्मा ज छे. भाई! आ तो जिनेन्द्रनो मार्ग एटले आत्मानो मार्ग. आत्मा जिनस्वरूप ज छे. कह्युं छे ने के- ‘जिन सोही है आत्मा,
शिष्ये एटलुं तो लक्षमां लीधुं के अबद्ध-स्पृष्ट एवा भूतार्थने आत्मा कहे छे. तथा एवा आत्मानी अनुभूतिने धर्म कहे छे. हवे शिष्य पूछे के एवा आत्मानी अनुभूति केम थाय? एवो आत्मा तो अमारा देखवामां आवतो नथी तो अनुभव केम थाय? अमारी नजरमां तो बद्धस्पृष्टत्वादि भावो आवे छे तो एनो अनुभव केम थाय? एनुं समाधानः– शिष्यना प्रश्नने समजीने गुरु समाधान करे छे के बद्धस्पृष्टत्वादि भावो अभूतार्थ होवाथी अनुभूति थई शके छे. बद्धस्पृष्टत्वादि भावो त्रिकाळ रहेवावाळी चीज नथी, बदली जाय छे, तेथी अभूतार्थ छे. ए कारणे एनाथी भिन्न अनुभूति थई शके छे. कर्मनो संबंध अने रागादिनो संबंध जे छे ए कायम रहेवावाळी चीज नथी, अभूतार्थ छे. माटे भूतार्थनो आश्रय करवाथी अभूतार्थनो नाश थई जाय छे. प्रश्नः– जे छे एने अभूतार्थ-असत्यार्थ केम कह्या? वर्तमान पर्याय तरीके सत्य छे, पण त्रिकाळ ध्रुवमां ए नथी. तथा बदली जाय छे तेथी कायम रहेवावाळा नथी माटे गौण करीने व्यवहार कहीने असत्यार्थ कह्या छे. भूतार्थ त्रिकाळी चीज भगवान आत्मानो आश्रय करतां ए अभूतार्थ छे एटले एनो नाश थई जाय छे. व्यवहारे व्यवहार छे, परंतु भूतार्थनुं लक्ष थतां ए छूटी जाय छे ए अपेक्षाथी अभूतार्थ कहेवामां आवे छे. बद्धस्पृष्टत्वादि भावो अभूतार्थ होवाथी अनुभूति थई शके छे ए वातने हवे द्रष्टांतथी प्रगट करे छेः- जेवी रीते कमलिनीनुं पत्र जळमां डूबेलुं होय तेनो जळथी स्पर्शावारूप अवस्थाथी अनुभव करतां जळथी स्पर्शावापणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे. अवस्थाद्रष्टिथी जोईए तो पाणीमां डूबेलुं कमलिनीनुं पत्र पाणी साथे व्यवहारथी संबंधमां छे ए सत्य छे. पाणीना संबंधमां कमलिनीनुं पत्र छे ज नहीं एम नथी. जळमां डूबेलुं छे एवी अवस्थाथी जोतां जळ अने कमलिनी-पत्रनो संबंध भूतार्थ छे, तोपण जळथी जराय नहि स्पर्शावायोग्य एवा कमलिनी-पत्रना स्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां जळथी स्पर्शावापणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे. कमलिनीना पत्रनी रूंवाटी ज एवी सुंवाळी होय छे के पाणी तेने अडतुं-स्पर्शतुं ज नथी. कमलिनी-पत्रना स्वभावनी