Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३० [ समयसार प्रवचन

समीप जईने एटले के एना स्वभावनुं लक्ष करीने जोवामां आवे तो जळथी स्पर्शावापणुं जूठुं छे. कमलिनीपत्रने जळ साथे बिलकुल स्पर्श नथी. पाणीमां डूबेलुं भले होय, छतां ते काळे पण स्वभावथी ज कमलिनीपत्र पाणीने स्पर्शतुं नथी. तेथी जळना संबंधनुं लक्ष छोडी कमलिनीपत्रना स्वभावनुं लक्ष करवामां आवे तो तेनुं जळथी स्पर्शावापणुं अभूतार्थ छे, जूठुं छे.

आवो वीतरागनो मार्ग छे. दर्शनशुद्धि विना गमे तेटलां व्रत, तप, नियम पाळे, नग्नदशा धारण करे तोपण आत्माना धर्मनो किंचित् लाभ थाय नहीं. सौ प्रथम दर्शन-शुद्धि प्रगट करवी ए मुख्य छे. ए दर्शनशुद्धि केम थाय ए कमलिनीना द्रष्टांतथी समजावे छे. अवस्थाद्रष्टिथी जुओ तो कमलिनी-पत्र जळमां डूबेलुं छे जळने स्पर्श्युं छे. जळमां डूबेलुं छे ते काळे पण स्वभावने जोतां एटलुं (एटलो संबंध) पण नथी. आ द्रष्टांत थयुं.

हवे सिद्धांतः-एवी रीते अनादि काळथी बंधायेला आत्मानो, पुद्गलकर्मथी बंधावा-स्पर्शावारूप अवस्थाथी अनुभव करतां बद्ध-स्पृष्टपणुं भूतार्थ छे, सत्यार्थ छे. निमित्त-नैमित्तिक संबंधरूप अवस्थाथी ज्ञान करवामां आवे तो बद्धस्पृष्टपणुं सत्य छे, पर्यायथी नथी एम नहीं. आत्मानी वर्तमान पर्यायमां रागनो अने कर्मनो संबंध व्यवहारथी छे. भगवान आत्माने अनादि कर्मरूप अवस्थाथी जुओ तो भिन्न-भिन्न अवस्थाओ एमां छे. तोपण पुद्गलथी जराय नहि स्पर्शावायोग्य एवा आत्मस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां बद्ध-स्पृष्टपणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे. द्रव्य-स्वभावनी द्रष्टिथी जोईए तो आत्मा पुद्गलथी किंचित्मात्र स्पर्शायेलो नथी. अवस्थाद्रष्टि छोडीने आत्माना एक त्रिकाळी स्वभावनुं लक्ष करतां, पर्यायनी रुचिमां स्वभावथी दूर हतो ते स्वभावनी समीप थयो. ए स्वभावनी समीप थईने अनुभव करतां बद्ध-स्पृष्टपणुं जूठुं छे. आमां धर्म शुं आव्यो? तो अवस्थाद्रष्टि छोडीने त्रिकाळी स्वभावनी द्रष्टि करी तेमां एकाग्र थतां भूतार्थनो अनुभव थाय छे अने ते सम्यग्दर्शन छे, धर्म छे.

आ धर्म छे, भाई! बाकी दया पाळो, व्रत करो, उपवास करो इत्यादि धूळेय नथी. ए तो बधो राग छे.

प्रश्न क्रियाकांडथी ज्ञानकांड थाय छे ने? प्रचंड कर्मकांड वडे अखंड ज्ञानकांड थाय छे एवुं जे शास्त्रमां (प्रवचनसारमां) आवे छे ए तो निमित्तनुं व्यवहारनयनुं कथन छे.