Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] २३१

अवस्थाद्रष्टिथी जुओ तो कर्मनो संबंध छे अनेते जाणवा लायक छे. सर्वथा बंध छे ए मान्यता द्रष्टिनी विपरीतता छे. पर्यायमां संबंध छे, परंतु पर्यायथी अधिक एवा त्रिकाळी ध्रुव ज्ञायकभाव उपर द्रष्टि देतां पर्यायद्रष्टिनो संबंध असत्यार्थ थई जाय छे. (एक चोकडीनो अनंतानुबंधीनो अभाव थई जाय छे) थोडो संबंध छे एनो पण त्रिकाळीमां तो अभाव ज छे. द्रष्टिमां तो एकसाथे अभाव थयो छे, थोडो संबंध पर्यायमां छे ए पछी व्यवहारथी गौणपणे जाणवामां आवे छे. सम्यग्दर्शन थतां अनंतानुबंधी कर्मनो अभाव थई जाय छे. बीजा जे कर्मनो संबंध पर्यायमां छे ते वस्तुना स्वभावनी द्रष्टिथी जोतां जूठो छे. वस्तु जे त्रिकाळ निरावरण निर्लेप, ज्ञान-ज्ञान-ज्ञाननो पुंज पडी छे एनी द्रष्टि करतां पर्यायभाव गौण थई असत्यार्थ थई जाय छे. द्रव्यस्वभाव साथे कर्मनो संबंध केवो?

भाई! रत्नकरंडश्रावकाचारमां स्वामी समंतभद्राचार्ये एम कह्युं छे के वस्तुनुं ज्ञान न्यूनता, अधिकता अने विपरीतता रहित यथार्थ होय ते सत्य छे, ते सम्यग्ज्ञान छे अने ते सम्यग्दर्शन सहित होय छे. खाली शास्त्रनुं भणतर ते सम्यग्ज्ञान नथी.

भगवान आत्मा पूर्ण, पूर्णस्वरूपे अंदरमां छे. अत्यारे ज छे, हमणां अहीं अंदर पडयो छे. जेम लींडीपीपरमां ६४ पहोरी-६४ पैसा-१६ आना एटले पूर्ण रूपियो-पूर्ण तीखाश शक्तिरूपे छे ते व्यक्तरूपे पूर्ण प्रगट थाय छे. प्राप्तनी प्राप्ति थाय छे. एवी रीते भगवान आत्मा पूर्णस्वरूप, मोक्षस्वरूप छे. शास्त्रमां आवे छे ने के ‘तुं छो मोक्षस्वरूप.’ एवा त्रिकाळ स्वभाव उपर लक्ष देतां वर्तमान अवस्था गौण थई जाय छे-असत्यार्थ थई जाय छे. भले थोडी अशुद्धता होय, पण ते वस्तुमां नथी.

बीजो बोलः– वळी जेम माटीने कमंडळ, घडो, झारी, रामपात्र आदि पर्यायोथी अनुभव करतां अन्य-अन्यपणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे. माटीने अवस्थाद्रष्टिथी जुओ तो भिन्न भिन्न आकारो जेमके प्याला, वाटका, आदि सत्य छे. माटीने भिन्न भिन्न पर्यायथी जोवी ए अशुद्धनय, व्यवहारनय छे. ए मलिनपणुं छे. प्रवचनसारमां ४७ नयना अधिकारमां आवे छे के माटीने पर्यायथी जोवी ए अशुद्धनय छे. परंतु सर्वतः अस्खलित एक माटीना स्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां अन्यपणुं अभूतार्थ छे. एकली माटी, माटी, माटी जोतां भिन्न भिन्न अवस्थाओ एमां नथी, अभूतार्थ छे-एटले एमां देखाती नथी. आ द्रष्टांत छे.

सिद्धांतः–एवी रीते नर-नारकादि पर्यायथी अनुभवतां-आ नारकी छे, आ मनुष्य छे, आ देव छे, आ एकेन्द्रिय छे, आ पंचेन्द्रिय छे, इत्यादि अवस्थाथी