वर्तमानमां जोतां अन्य-अन्य गतिरूप अवस्थाओ छे. अंदरमां आत्मानी मनुष्यपणानी, नारकीपणानी आदि योग्यतारूप पर्याय छे. बहारमां मनुष्य के नारकीनो देह देखाय छे एनी वात नथी. ए तो जड माटी छे, ए कांई मनुष्यादि पर्याय नथी. वर्तमान अवस्थाथी जोवामां आवे तो गति आदिना भिन्न-भिन्न- अन्य-अन्य भाव सत्यार्थ छे पण एमां अखंड आत्मा न आव्यो. खंड-अंश-पर्याय आवी. तेथी ते व्यवहारनय छे.
व्यवहारनयथी नरक, मनुष्य, देव, तिर्यंचपणुं इत्यादि पर्यायमां छे, तोपण सर्वतः अस्खलित एटले सर्व पर्यायभेदोमां जराय भेदपणे नहि थवारूप एवा चैतन्याकार आत्मस्वभावने जोतां नरक, मनुष्य के पंचेन्द्रियादिनी जे योग्यताओ पर्यायमां छे ते सर्व योग्यताओ अभूतार्थ छे. ते अन्य-अन्य पर्यायोथी ज्ञायकभाव भेदरूप थतो नथी. पर्यायमां त्रिकाळी आवतो ज नथी.
माटीनां वासण कहेवां ए व्यवहार छे. माटी माटीरूप छे ए निश्चय छे. एकरूप माटी, माटीने जुओ तो ए भेदरूप अवस्थाने स्पर्शती नथी. भगवान आत्माने कर्मना संबंधमां नारकी, पशु, एकेन्द्रियादि भिन्न-भिन्न गति छे ए व्यवहार छे. अवस्थानी द्रष्टिथी जोतां ए सत्य छे, तोपण चैतन्याकार एक ध्रुव ज्ञायकभावनी द्रष्टि करतां ए पर्यायभेदो कांई नथी. त्रिकाळीभाव भेदोने स्पर्शतो नथी. एकरूप स्वभावमां भेदो कांई नथी.
भाई! आ तो वीतराग मार्ग! अनंतकाळमां अनंतवार द्रव्यलिंगी नग्न दिगंबर मुनि थईने नवमी ग्रैवेयक गयो पण आत्मज्ञान विना लेशपण सुख पाम्यो नहीं. अहीं कहे छे भगवान आत्मा-ज्ञायकभाव-एक चैतन्यरसस्वभाव कदीय भेदरूप थयो ज नथी. जेम सूर्यनो प्रकाश अंधकाररूपे थतो नथी तेम भगवान ज्ञान- प्रकाशपुंज कदीय पुण्य-पाप जे अंधकार अने अचेतनरूप छे ते रूपे थतो नथी. एथी विशेष वात अहीं कहे छे के ज्ञायक-ज्ञायक-ज्ञायक एक चैतन्याकार स्वरूप आत्मा गति आदि कोई पर्यायोथी किंचित्मात्र भेदरूप थतो नथी.
अहीं एम कहे छे के त्रिलोकीनाथ भगवान सत् वस्तु ए माझा (मर्यादा-हद) न मूके. ए भेदमां के पर्यायमां आवे नहीं. अनादिनी एक समयनी पर्याय उपर द्रष्टि छे त्यांसुधी आत्मभगवान दूर छे. पर्यायद्रष्टि छोडी त्रिकाळीमां जुए तो आत्मस्वभाव समीप थई जाय अने त्यारे पर्यायभेद असत्यार्थ थई जाय छे. अभेदनी द्रष्टिमां भेद देखातो नथी एनुं नाम सम्यग्दर्शन छे. अहो! आ पंचम आरामां भगवान कुंदकुंदाचार्यदेवे तीर्थंकर जेवां अने अमृतचंद्राचार्यदेवे गणधर जेवां काम कर्यां छे.