जेवी रीते स्वचेतननी अपेक्षाए बीजा चेतन अने जड असत् छे. भले ए पोत-पोतानी अपेक्षाए सत् होय. आ आत्मानी अपेक्षाए अरिहंत अने सिद्ध परमात्मा पण अनात्मा (आ आत्मा नहि) छे. एवी रीते अंदरमां त्रिकाळीनी अपेक्षाए पर्याय असत् छे. पर्यायनी अपेक्षाए पर्याय सत् छे.
अहीं कोई एम कहे के-तो पछी पर्यायनी अपेक्षाए द्रव्य असत्-एम खरुं के नहीं? पर्यायनी अपेक्षाए द्रव्य अभूतार्थ अने द्रव्यनी अपेक्षाए पर्याय अभूतार्थ ए तो जाणवानी अपेक्षाए वात छे. आश्रय करवानी अपेक्षाए तो द्रव्य ज एक त्रिकाळ सत् रहे छे अने ए ज भूतार्थ छे. आश्रय करवा माटे कदीय पर्याय सत् अने भूतार्थ होय नहीं.
अहीं ‘पर्यायथी अनुभव करतां’ एम ज्यां आवे त्यां ‘अनुभव करतां’ एटले ‘ज्ञान करतां’ अने ‘द्रव्यनो अनुभव करतां’ एम आवे त्यां ‘द्रव्यनो आश्रय करीने’ एम अर्थ छे. द्रव्यस्वभाव सर्वतः अस्खलित छे. त्रिकाळी ज्ञायकभाव अभेद एकरूप वस्तु कदीय अनेकरूपमां जतो नथी, पर्यायने स्पर्शतो नथी. द्रव्य पर्यायने आलिंगन करतुं नथी. प्रवचनसार १७२ गाथानी टीकामां अलिंगग्रहणना १९मा बोलमां आवे छे के लिंग नाम पर्यायने द्रव्य स्पर्शतुं नथी; केमके स्पर्श करे तो एक थई जाय. त्रिकाळीनी अपेक्षा अनेरी अनेरी गति अभूतार्थ छे, एनी हयाती ज नथी. प्रश्नः– एकांत थई जाय छे ने? उत्तरः– त्रिकाळीनुं ज्ञान सम्यक् एकांत छे.
प्रश्नः– शुं एकांत पण सम्यक् होय?
उत्तरः– हा, ‘एक’ चैतन्यस्वभाव सम्यक् एकांत छे. सम्यक् एकांत विना
भाई! आ तो सर्वज्ञ परमेश्वरनी दिव्यध्वनिमां कहेलो मार्ग छे. लोकोने सांभळवा न मळे एटले शुं थाय? बिचारा क्रियाकांडमां रच्यापच्या रहे अने एम ने एम काळ पूरो थई जाय. वळी महिमा पण एनो करे के आने आ त्याग छे अने आने ते त्याग छे. पण अरे! द्रष्टिमां आखा आत्मानो त्याग थई जाय छे एनी खबर न मळे. त्रीजो बोलः– जेम समुद्रनो, वृद्धि-हानिरूप अवस्थाथी अनुभव करतां अनियतपणुं (अनिश्चितपणुं) भूतार्थ छे, सत्यार्थ छे. पर्यायथी जोवामां आवे तो भरती अने