Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३४ [ समयसार प्रवचन

ओट एम वृद्धि अने हानिना प्रकारो समुद्रमां थाय छे ए सत्य छे. पूनमना दिवसे समुद्रमां भरती आवे छे. समुद्र अने चंद्रने एवो निमित्त-नैमित्तिक संबंध छे. आम- वर्तमान भेदद्रष्टिथी जोतां वृद्धि-हानि सत्यार्थ छे, तोपण नित्यस्थिर एवा समुद्रस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां अनियतपणुं अभूतार्थ छे, असत्यार्थ छे. वृद्धि-हानिने गौण करीने नित्य-स्थिर समुद्रस्वभावने जोतां अनियतपणुं जूठुं छे. समुद्रनुं मध्यबिंदुं ज्यां छे त्यां एकरूप स्थिर स्वभावे समुद्र छे. ए नित्य-स्थिर स्वभावमां वृद्धि-हानि छे नहीं. आ द्रष्टांत थयुं.

सिद्धांतः– एवी रीते आत्माने, वृद्धि-हानिरूप पर्यायभेदोथी जोवामां आवे तो अनियतपणुं-ओछुं-अधिकपणुं छे. ज्ञाननी पर्यायमां ओछुं, अधिक ज्ञान थाय छे. कोईवार नवपूर्वनी लब्धि प्रगटे एवी ज्ञाननी पर्याय थाय छे तो वळी कोईवार अक्षरना अनंतमा भागे पर्यायमां उघाड देखाय छे. डुंगळी, लसण, मूळा आदि कंदमूळमां निगोदना जीवो छे. एक राई जेटली कटकीमां असंख्यात शरीर छे. एक एक शरीरमां आज सुधी जेटला सिद्ध थया एना करतां अनंतगुणा जीव छे. छ मास अने आठ समयमां ६०८ जीव मोक्षे जाय छे. एम आजसुधी अनंतकाळमां अनंत जीवो सिद्ध थया छे. ए अनंत सिद्धोथी अनंतगुणा निगोद जीव छे. निगोदना जीवोनी पर्यायमां अक्षरना अनंतमा भागनो विकास छे. तेमांथी कोई जीव बहार नीकळी मनुष्य थई द्रव्यलिंगी साधु थाय अने पर्यायमां नवपूर्वनी लब्धि प्रगट पण करे. आम आत्माने वृद्धि-हानिरूप पर्यायभेदोथी जोतां अनियतपणुं सत्यार्थ छे. व्यवहारनयथी पर्यायमां वृद्धि-हानि छे ए सत्य छे.

तोपण नित्य-स्थिर (निश्चल), उत्पाद-व्ययरहित ध्रुव आत्मस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां अनियतपणुं अभूतार्थ छे. आत्मस्वभावमां वृद्धि-हानि नथी, उत्पाद-व्ययमां वृद्धि-हानि भले हो. पर्यायमां केवलज्ञान थाय तोपण ध्रुवस्वभावमां कांई ओछप न आवे अने निगोदमां अक्षरना अनंतमा भागे क्षयोपशम थई जाय एटले नित्य-स्वभाव, ध्रुवस्वभावमां कांई वधी जाय एम नथी. पर्यायमां हीनाधिकता हो, वस्तु तो जेवी छे तेवी ध्रुव ध्रुव ध्रुवस्वभाव ज रहे छे.

अहाहा...! विषय तो ए चाले छे के आत्मानी ज्ञान, दर्शन, वीर्य आदिनी पर्यायमां एकपणुं नथी, वृद्धि-हानि थाय छे. पर्यायना लक्षे जोतां ए वृद्धि-हानि सत्यार्थ छे. सत्यार्थनो अर्थ ‘छे.’ हवे पर्यायना लक्षे त्रिकाळी आत्मा अनुभवमां आवतो नथी, दूर रहे छे. तथा आत्मानां सम्यक् श्रद्धान-ज्ञान तो त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायकभावनो अनुभव करतां थाय छे. तेथी ध्रुव, निश्चल नित्यानंदस्वभाव भगवान आत्मानी समीप जईने-